Friday, May 20, 2011

तीन बंदरों की दोस्ती


तीन बंदरों की दोस्ती

पोस्टेड ओन: May,20 2011 जनरल डब्बा में
गांधी जी अचानक अवतरित हो गये। उन्होंने अपने तीनों बंदरों को बुलाया। शांति, संप्रभुता के गुर सिखाये और तीनों को तीन देशों की यात्रा पर भेज दिया। पहला बंदर अमेरिका पहुंचा। दूसरा पाकिस्तान की सरजमीं पर तो तीसरा पड़ोस में चीन पहुंच गया। तीनों बंदर राजनीतिक, कूटनीतिक शब्दों से लैस। सांस्कृतिक एकता का पाठ रट चुके थे। भाषावाद, राष्ट्रवाद के सूत्र हर-हमेशा तीनों के मुंह पर। आतंकवाद, भ्रष्टाचार, अलगाववाद पर बहस, भाषण करने में तीनों माहिर, सक्षम। सो तीनों अलग-अलग देशों में अलग-अलग तरीके से रात्रि भोज में शामिल हुये। समानता यह कि तीनों गांधी टोपी लगाये हुये थे। पहला अमेरिकी बंदर, ओबामा को समझाया-सुनो कुछ भी नहीं सिर्फ जो मन आये करो, मारो। दूसरा पाकिस्तानी राष्ट्रपति गिलानी से मुखातिब था- कुछ बोलो नहीं, बस देखते जाओ। तीसरा, चीनी राष्ट्रपति हू जिन ताओ को पाठ पढ़ाया- न सुनो न देखो न ही कुछ बोलो। बस अपनी मनमर्जी, चुपचाप रहो। तीनों बंदर तीन दिनों की यात्रा व मेजबानी करने के बाद स्वदेश इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर उतरे। उनके समर्थक, कार्यकर्ता सबों ने गर्म-जोशी से उनका स्वागत किया। प्रेस वाले भी एक क्षण तीनों को कैमरे में कैद करने को बैचेन थे। एक बाइट प्लीज- तीनों बंदर कुछ बोलने से बच रहे थे। एक ने कहा-अमेरिका, पाक व चीन को भारत पर पूरा भरोसा है। अब भारत को कुछ सोचना, करना होगा। हम सोच रहे हैं कि हमें ऐसे हालात में क्या करने चाहिये। अफगानिस्तान जाना चाहिये या मोस्ट वांटेडों की सूची को और लंबी कर देनी चाहिये। हम सोचेंगे और उसके बाद आप लोगों को बहुत जल्द रास्ता दिखायेंगे। यह कहकर तीनों बंदर अलग-अलग उड़ानें पकड़ी और पहुंच गये वापस जहां से आये थे। अब चीन को यह बात खटकने लगी। उसे बंदर की बातें याद आने लगी। बंदर ने कहा था- पाकिस्तान उस दोराहे पर आज खड़ा है जहां से उसके तमाम रास्ते, विकल्प खुले हैं। वह आतंकवाद विरोधी मुहिम का हिस्सा भी है नहीं भी। वह गरीब भी है, अमीर भी। मदद के लिये उसके हाथ खुले भी हैं बंद भी। एक हाथ से वह अमेरिकी ताली पिट रहा है तो दूसरी तरफ वह तुम्हे चीनी-पाक भाई-भाई कह रहा है, तुम्हारा सहयोग भी ले रहा है। चीन लादेन प्रकरण पर कुछ बोलने के बदले अत्याधुनिक एटमी संयंत्रों का न सिर्फ जखीरा तैयार करने में बल्कि घरेलू स्तर पर यूरेनियम के भंडारों की खोज में तेजी से जुट गया। उधर, पाकिस्तानी अखबारों ने दूसरे बंदर को उछाल दिया कि चीन, खासकर लादेन के मारे जाने के बाद जिस खामोशी से अपना काम निबटाया, चुप्पी के बीच पाकिस्तान को हौले-हौले पुचकारा वह कहीं से भी पाक की सेहत के लिये शुभ संकेत नहीं है। इधर, अमेरिका में बंदर की बात से ओबामा परेशान। बंदर ने ओबामा को रात्रि भोज के बाद अलग से समझाया था। अरे ओबामा, कई आतंकी संगठनों से पाक के अस्पष्ट संबंधों को लेकर तुम्हारा प्रशासन पहले ही बंटा है। अब एक बार चीन को न्योता भेजो। कुछ मदद लो। चीन की बढ़ती ताकत के एहसास से तुम पहले से ही चिंतित हो। उसका अनुमान भी तुम्हें है। चीन के लिये ही तो तुमने जमीन से उड़ान भरकर मारने वाला ड्रोन तैयार कर रहे हो। वह सब बाद में बनाना। चीन कहीं पाक को ले न उड़े। इस पर ध्यान दो। तुम उसे कोएलिशन सपोर्ट फंड से 13 अरब दे भी रहे हो और वह गद्दार कहीं चीन से दोस्ती न गांठ लें। ओबामा का ध्यान भंग हुआ। उसे लगा बंदर की बात में दम है। अमेरिका की वाहवाही में उसका सबसे प्रबल व खतरनाक दुश्मन एक साइलेंट किलर सरीखे चीन लगातार पाक से रिश्ते गांठ रहा है। उसे सुरक्षित, संरक्षित, पोषित करने में जुटा है। यहां तक कि पूरे विश्व समुदाय को भी स्पष्ट संकेत दे रहा है कि पाक पर हमला चीन बर्दाश्त नहीं करेगा। पाक को पचास थंडर विमान भी दे रहा है। ओबामा ने फरमान सुनाया, चीन के विदेश मंत्री को आनन-फानन में अमेरिका बुलवाया। पाक को लेकर चिंता जतायी। दोनों ने पाक को लपेटे में लिया। एक रणनीति पर चीन ने बाद में गिलानी को चीन बुलाया। दूसरी तरफ, अमेरिका ने मुंबई हमले का राग अलापा। हमले में लश्कर-ए-तैयबा का हाथ बताया। भारत को भरोसा दिलाया, उसका खुफिया सबूत बुश प्रशासन ने ही लिखित तौर पर पाक को उपलब्ध करा दिया था अब पाक वांटेडों को पकडऩे उसे वापस इंडिया भेजने में दिलचस्पी दिखाये। इधर, तीनों बंदर ने आकर सामूहिक रूप से सच्चाई सरदार जी को बता दी। वे अफगानिस्तान पहुंच गये। कहने लगे गरीबी में जी रहे पाकिस्तानी जनता को वहां की सरकार चौथा रिएक्टर चालू कर क्या देना चाहती है। पाक का परमाणु हथियार कार्यक्रम इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि वहां प्लूटोनियम के उत्पादन में वृद्धि के लिये शीघ्र ही चौथा रिएक्टर चालू हो जायेगा। काबुल में उसने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई से साफ कहा हमें बंदरों की बात पर पूरा यकीन है। चीन ने अपने स्वास्थ्य व्यय और स्वास्थ्य बीमा के जरिये भी भारत को पछाड़ अपने नागरिकों की सेहत के मामले में हमसे काफी अधिक सुधार कर लिया है। लादेन के मारे जाने के बाद अफगानिस्तान व पाक के बीच जो कटु रिश्ते बने हैं और पाक जो खुशाब परमाणु स्थल पर निर्माण कार्य में जुटा है वह अफगान व भारत के लिये चिंता का विषय है। चिंता तो यही है कि लादेन के ठिकाने पर अमेरिकी हमले को लेकर आयोजित पाक की नेशनल एसेंबली के संयुक्त सत्र के दौरान पाक सेना प्रमुख जनरल मुशफाक परवेज को सिगरेट मां कर पीनी पड़ी है। गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की 1924 की ऐतिहासिक चीन यात्रा की भावना का सहारा लेकर दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संबंधों की आड़ में जो खेल चीन खेलना चाहता है उसे हमारे बंदर जान चुके हैं। लादेन के एबटाबाद में सैन्य अकादमी के पास सालों गुजारने से साफ है कि मुंबई हमले में आइएसआइ का हाथ है। अब अगर अमेरिका, चीन व पाक आतंकवाद के मुद्दे पर नहीं चेते, भारत को अलग-थलग करने की साजिश से बाज नहीं आये तो हमारे बंदर तीनों के मंसूबे नाकाब करने में सक्षम हैं। हम अगर किसी आतंकी को जी कह सकते हैं तो उसकी जान भी ले सकते हैं। कसाब के बारे में हमारा रूख देखकर भी अगर विश्व हमारी सहनशीलता का प्रमाण चाहता है तो हम तैयार हैं।
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Sunday, May 8, 2011

राखी दिल से


राखी दिल से
राज। बोलो राखी। राज जब से तूने मुझे मनसे बुलाया है मैं मनसे तुम्हारी हो गयी हूं। मेरा मन अब किसी और काम में नहीं लगता। न शूटिंग में ना ही घर में। ना ही इंसाफ का अब मैं यंत्र ही बांट पा रही हूं। स्वयंवर रचा के जो गलती की थी आज वो मनसे अहसास हो रहा है। मेरे मन मयूर पर अब तुम्हारा ही राज है। मैं तुम्हारे लिये एक आइटम करना चाहती हूं। मैं वो करना चाहती हूं जो तुम्हारे चचा जान भी चाहते हैं। शरमाओं मत राज। इस आइटम मैं तुम वो करोगे जो स्वामी नित्यानंद ने किया था और मैं चेरी ब्लेयर की तरह उसे बेपर्द करूंगी। देखो न राज मैं राखी हूं। राखी सावंत। मैं तुम्हारी कलाई भी मरोड़ सकती हूं और उसे थाम भी सकती हूं। मैं थप्पर भी जड़ सकती हूं और तुम्हारे गालों को अनगिनत चूम भी सकती हूं। लोग मुझे राखी कहते हैं राज। मैं तुम्हें आत्महत्या के लिये उकसा भी सकती हूं और मैं वो एक ही टेक में बिना रूकावट के करूंगी जो हमारा स्पेशल आइटम होगा। अब देखो न राज। स्वामी नित्यानंद पर सत्यानंद फिल्म बन रही है। सत्यानंद के निर्माता-निर्देशक लगातार हमसे संपर्क में हैं। कहते हैं ये स्पेशल आइटम आप हमारे सत्यानंद के लिये करें लेकिन मैंने साफ कह दिया है कि यह आइटम मेरा अपना होगा। इसके बाद हम बिपाशा की तरह ही बल्कि उससे पहले ही आइटम की डीवीडी मार्केट में लांच कर देेंगे। राज-राखी मनसे के बैनर तले। तुम्हारे चचा जान भी प्रिंट निकालने को बेताब हैं। बस एक बार आइटम करने का मौका दे दो। तभी मोबाइल की घंटी बजती है। मैं बोल रहा हूं मि.राज। सत्यानंद का निर्माता। आप तो राज अश्लीलता के विरोधी रहे हैं। फिर राज-राखी मनसे के बैनर तले ये विशेष आइटम का डीवीडी निकालने का टेंशन क्यों। आप दोनों मेरे फिल्म के लिये यही आइटम...। इसमें टेंशनवा का का बात है। मैं राज हूं। मैंने शकुनी मामा से बात कर ली है। राखी देश की नागिन है और मैं नाग। अब तो ये आइटम का डीवीडी निकल के रहेगा। शकुनी मामा की बात में दम है। चालीस साल की उम्र तक टेस्टो स्टेरोन हार्मोन बहुत कम हो जाता है और पुरुषों में सेक्स की इच्छा बढ़ जाती है। अरे जब 57 साल के टोनी ब्लेयर एक रात में कम से कम पांच बार प्यार कर सकते हैं। हैरी पोर्टर पर प्यार का बुखार चढ़ सकता है तो मनसे अभी तो मैं जवान हूं। ठीक है मि.राज अगर आप खुद के बैनर तले डीवीडी लांच करने की सोच ही ली है तो कब तक निकालेंगे यह बता दीजिये मैं उसकी कापी इमरान हाशमी व मल्लिका शेरावत से करवा लूंगा। देखिये मि.निर्माता महोदय। ऋतिक व कैटरीना की फिल्म जिंदगी ना मिलेगी दोबारा के एक दृश्य में सोलह टन टमाटर इस्तेमाल किया गया है। लेकिन मेरे इस विशेष आइटम में टमाटर तो होगा ही साथ ही प्याज, चुकंदर, गाजर, पत्ता गोभी, आदी, लहसून, मिर्चा सब के सब टन के हिसाब से लिये जायेंगे। बाजार का राखी सर्वे कर रही है। जिस मंडी में हमें जिस दिन इसका सस्ता टेंडर मिल गया सप्लाई होते ही हम मूड में और डीवीडी बाजार में। आपने देखा है कि नहीं। सभी चैनलों पर हमारे डीवीडी का प्रचार चल रहा है। बड़े-बड़े फ्लैक्स बाजारों, मोल में लटक रहे हैं। महिला सशक्तिकरण की मिसाल, हसीन, चुलबुली, बेबाक ग्रहों की जन्मदाता, हस्तरेखा विशेषज्ञ, जन्म पत्रिका, वास्तु विशेषज्ञ, इन्साफ यंत्र साम्राज्ञी, भावी मुंबई की सीएम मिस लिखूं या मिसेज, दोनों चलेगा-राखी सावंत का अब तक का सबसे सनसनीखेज आइटम। प्रेरणादात्री पूनम पांडेय को समर्पित इस डीवीडी में आप देखेंगे राज को एक नये अवतार में। देखना न भूले। जल्द आ रहा है आपके शहर के डीवीडी लाइब्रेरी में। अभी-अभी हमारे दफ्तर में विशेष आइटम की शूटिंग की विशेष फुटेज आ गयी है। हम दिखायेंगे आपको। दिखायेंगे कैसे राज के लिये पूनम बनी राखी साथ में और भी बहुत कुछ। बने रहिये हमारे साथ।      

कुछ तो सीखो फालतू में


कुछ तो सीखो फालतू में
यह देश है भ्रष्टाचारियों का। रिश्वतखोरों का। इस देश का यारों क्या कहना। यहां जन भ्रष्टाचारी, गण भ्रष्टाचारी, मन भ्रष्टाचारी। फिर फालतू में भ्रष्टाचार पर बोलने की पाले हो बीमारी। जिस भारत के भाग्य विधाता भ्रष्टाचारी हों वहां काहे का भ्रष्टाचार हटाओ-देश बचाओ फालतू में। इस देश को आखिर हुआ क्या है। कहां है भ्रष्टाचार जो हटाओगे। अरे अब तो गर्व करो। भ्रष्टाचार में भी हम नंबर एक रैकिंग पर हैं। जश्न मनाओ। देश में भ्रष्टाचार उत्सव मनाओ कि मन में है विश्वास पूरा है विश्वास कि भ्रष्टाचारी होंगे कामयाब एक दिन। तब शुभ नामे जागेंगे भ्रष्टाचारी तब शुभ आशीष मांगेंगे भ्रष्टाचारी और तब जन-गण-मन जय होगा और सारे जहां से अच्छा अपना हिन्दुस्तां होगा। गोदी में खेलेंगे जिसके हजारों भ्रष्टाचारी, गुलशन होगा जिसके दम से रश्के जिना हमारा। और तब गायेंगे हम सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा। अरे वाह, तूने तो भ्रष्टाचारियों की फेहरिस्त भी निकाल ली। अब उनकी जयंती, पुण्यतिथि मनाओ। भ्रष्टाचार देश में फालतू नहीं है। यह देश के हर वासियों का राइट है कि वे भ्रष्टाचारी बनें। भ्रष्टाचार को संरक्षित करें। उन्हें मदद पहुंचाये और भ्रष्टाचार के खिलाफ चौक-चौराहों से लेकर संसद तक मौन रहें। अब इसी बोलने के चक्कर में फंस ही गये अन्ना। भ्रष्टाचार हटाओ। अरे काहे का हटाओ भ्रष्टाचार। क्या बिगाड़ा है तुम्हारा भ्रष्टाचार ने। अरे हजारी जी। भ्रष्टाचारी कोई अतिक्रमणकारी तो हैं नहीं, ना ही कूड़ा-कचरा कि यहां से हटाओ। ये भ्रष्टाचार पूरे देश का भ्रष्टाचार है। उस महान देश का भ्रष्टाचार जिसने सदियों तक गुलामी की बेड़ी देखी है। अब आजादी का जश्न मनाने दो। फालतू में जो शांत भी रहना चाहता है उसे भी बोलने को उकसाओ मत। बेचारे,आडवाणी जी। बोलना नहीं चाह रहे थे लेकिन फालतू में उन्हें भी बोलवा ही लिया। सोनिया जी भ्रष्टाचारियों को देखना नहीं चाहती। अपना वो अमूल बेबी भ्रष्टाचार पर क्या कुछ नहीं कहा फालतू में। बार-बार कहता हूं फालतू बोलने की आदत मत डालो। अरे चुप रहकर भी देश का भला हो सकता है। ये अपने प्रधानमंत्री से क्यों नहीं सीखते। कितना बढिय़ा पूरा देश विश्व कप के जश्न में डूबा था कि कहां से फालतू में पहुंच गये अन्ना। जंतर से मंतर मारने। पूरे देश को नींबू पानी पिलवाने। फालतू, क्या जरूरत थी इसकी। घर-घर में अन्ना पैदा करने लगे फालतू। अरे देश की सेवा ही करना चाहते हो, कुछ देना ही चाहते हो। समाज के लिये कुछ करना ही चाहते हो तो चुपके-चुपके करो ना बोलने की क्या जरूरत है फालतू में। ठीक है, अपने देश के प्रधानमंत्री से नहीं कुछ सीख सकते। समझ गये वामपंथी, भाजपाई हो फालतू में तो चेक रिपब्लिकन के राष्ट्रपति से सीखो। लेकिन कहीं तो सीखो फालतू में। सीखो कैसे चेक के राष्ट्रपति वाक्लॉव क्लास का दिल परेशान हो उठा। अब लोगों को तो बोलने की बीमारी है फालतू में सो उनको कलम चोर बना दिया। लेकिन ये कलम उन्होंने खुद के लिये चुरायी होती तब ना। उनका दिल कितना उदार, महान है ये ना सीखो फालतू में। अरे उन्होंने कर्ज में डूबे मेक्सिकाना एयरलाइंस के कर्मियों के लिये कलम चुरायी जिन्हें कंपनी ने 2010 में एयरलाइंस की उड़ान रद्द होने के बाद बेकार कर दिया। कुछ बेकार महिलाकर्मियों ने तो मेक्सिकाना फ्लाइट एटंडेट्सन प्ले बॉय मैगजीन के अप्रैल 2011 मैक्सिन एड्रीशन के लिये कपड़े उतार दिये और मैगजीन के कवर पेज पर न्यूड पोज देकर लाखों डालर कमा लिये। लेकिन बाकी कर्मियों का। बेचारे राष्ट्रपति को यह सब देखा नहीं गया। वे मौका मिलते ही बेशकीमती लेपीज लेजुली नामक नीले रंग के पत्थर से बनी कलम चुरा ली ताकि उसे बेचकर उन मुफलिसी में जी रहे कर्मियों को दो वक्त का राहत दे सके। आखिर, राष्ट्रपति उन कर्मियों को नोएडा में रह रही उन सगी बहनों की तरह डिप्रेशन में कैसे देख सकते थे। उन्हें पता था कि जल्द कुछ नहीं किया तो फिर पुलिस डायरी के पन्नों में राज ही टटोलते फिरेगी। सो जल्दबाजी में वही कलम हाथ लग गया। तो भाई नेता हो तो ऐसा। कुछ सीखे फालतू में। अरे अब भी वक्त है कुछ सीख लो इस राष्ट्रपति से। नहीं तो यूं ही बात-बात पर बकवास करते रहोगे फालतू में।

शर्म करो और जिंदा रहने दो


शर्म करो और जिंदा रहने दो

अब यही बाकी बचा था। इसे भी पूरा कर दो। क्यों रखोगे बच्चों को भी चैन, सुकून में। उनसे उनका बचपन भी छीन लो। उसे भी बाजारवाद की अंधी गलियों में परोस दो। बना दो एक जीवंत उत्पाद। जो सज-संवर के बिक रहे हैं अभी चोरी-छिपे। उसे खुले बाजार का हिस्सा बना डालो। बिकने दो उनके जिस्म और खरीद लो मनचाहा बचपन। बच्चे अब तक ही कहां थे सुरक्षित। कहां था उनमें बालपन कि उसे सेक्स की शिक्षा देकर खड़ा करना चाहते हो चौराहों पर। खुले बदन निहारना चाहते हो चंचलता को। समाज के सामने खुद की भूख के लिये खड़ा करना चाहते हो मासूमों को, तो देख नहीं रहे, तुम्हारे सामने है समाज का सच। सब कुछ बिल्कुल साफ। समाज में कई नाम हैं इन फेहरिस्त में। खंगाल लो पुलिस फाइल से। झांक कर देखो शहर से लेकर गांवों तक के स्कूलों में। दीवारों पर तुम्हें वैसे ही मिल-मिलेंगे पढऩे के लिये कई किस्से, जिससे तुम्हारे अंदर की हैवानियत जाग जायेगी। बहशी हो जाओगे तुम यह जानकर कि जिन्हें तुम कल-तलक मासूम, समझ रहे थे वो उससे आगे हैं। स्कूलों के ब्लैक बोर्ड से लेकर बाथरूम व अन्य दीवारों पर कभी झांक कर देखो वहां तुम्हें वैसे ही बचपन जवान होता दिखेगा। फिर क्यों उसे और उसकाना चाहते हो। उन दीवारों पर परोसे जा रहे अश्लीलता को तुम व्यवहार में लाना चाहते हो पढ़ाओगे ही कि सेक्स क्या है। कैसे करते हैं तो तेरी मर्जी। पढ़ाकर ही देख लो। तुम्हारा सभ्य समाज कहां जाकर रूकता, ठहरता है देख लेना। अभी तुम्हारा कालेज तो दूर, स्कूल परिसर के बाहर ही अभद्रता है। चाट-पकौड़े खाते, पान चबाते, सिगरेट पीते मनचले लड़कों को लेकर वहां खूब चल रही है लोगों की दुकानें। अब तुम भी स्कूल-कालेज परिसर में खोल लो कंडोम की दुकान ताकि प्रैक्टिकल ज्ञान वो अपने मनपंसद फ्लेवर के साथ कर सकें। अरे अब भी शर्म करो। चेत जाओ। मां-बाप के बेडरूम में बच्चों को मत झांकने की इजाजत दो। देख नहीं रहे हो जेएनयू में छात्रायें पोर्न धंधे में लिप्त मिल रही हैं। बड़े-बड़े स्कूलों की लड़कियां सेक्स रैकेट में संलिप्त हैं। ब्लू कैसेट बच्चे बेच ही नहीं रहे बल्कि बड़ों के साथ हमबिस्तर होते तुम उन्हें परोस भी रहे हो खुलेआम। फर्क भी सामने आ रहा है। बड़े-बड़े शहरों में बच्चों का अभिवादन करने का तरीका भी तुम्हारे लिये मुसीबत बन गया है। बच्चे अब हाथ मिलाकर या गले मिलकर अभिवादन नहीं कर रहे बल्कि चुंबन लेकर कर रहे हैं। होठों पर किस करते देख शिक्षिकायें भी हैरान हैं। अब सेमिनार होगा। माता-पिता को बुलाया जायेगा। अभी तो बुलाबा है बाकी क्या होगा खुद सोच लो। कहां ले जाना चाहते हो बच्चों को। क्या शिक्षा देना चाहते हो उन्हें। किसको कहोगे कल होकर शिक्षित। सोचो, जब तुम्हारे घर में बच्चे सेक्स के बारे में तुम्ही से सवाल दागेंगे। कहेंगे, पूछेंगे। अश्लीलता तुम्हारे घर से ही शुरू हो जायेगी। तुम क्या सिर उठाकर नजरें मिलाकर बच्चों से बात कर सकोगे। वैसे चिंता की कोई बात नहीं। मुंबई की सांसद प्रिया दत्त ने यौनकर्मियों को मान्यता दिलाने की पहल, बात कर रही है। शुक्र मनाओ, अगर इस कालेज को मान्यता मिल गयी तो तुम्हारे बच्चों को यौनकर्मी की नौकरी तो समझो एकदम पक्की। क्या कहां मैं कुछ गलत कह रहा हूं। क्यों तुम्ही बतलाओ इसमें बुरा क्या है। जो पढ़ोगे उसी फैकेल्टी की नौकरी मिलेगी ना। समाज में लोग शिक्षा मित्र की नौकरी पा ही रहे हैं। विकास मित्र बन ही रहे हैं तो यौन मित्र बनने में गुरेज कैसा। बच्चे को यौन शिक्षा देने पर आमादा हो लेकिन उसे यौनकर्मी नहीं बनाओगे। नौवीं व ग्यारहवीें के बच्चों को यौन शिक्षा देने पायलट प्रोजेक्ट बना चुके हो। बारह साल की उम्र में बच्चों के बीच सेक्स को वैध करार देने के लिये प्रस्ताव पर विचार कर रहे हो। बारह साल के बच्चों के बीच नान पैनेट्रटिव सेक्स यानी बाहरी अंगों के साथ सेक्स को अपराध मानने से इनकार के लिये मसौदे तैयार कर रहे हो। बाल विकास मंत्रालय के पास प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल आफसेज बिल 2010 पड़ा है लेकिन तुम तो बच्चों को रूपम पाठक बनाना चाहते हो जो एक दिन खुद खंजर उठाकर तेरे सिने पर खड़ा हो जाये। परोसो, खूब परोसो। नग्नता को उछालो। मगर सोच लेना पहले और बाद का सेंस आफ सेक्स। बच्चे तुम्हारे हैं। सेक्स की पढ़ाई तुम्हारी जरूरत ही है। इसके बिना तुम शिक्षित नहीं कहला सकते तो एक सलाह बिन मांगें दे रहा हूं- शहर वालों मान लेना गांव मेरा आ गया-बच्चियों के सर पे जब आंचल नजर आने लगे।    

देख ले घूम कर मेरा हिन्दुस्तां


देख ले घूम कर मेरा हिन्दुस्तां
कारगिल युद्ध में शहीद लोगों के नाम पर हमारे देश में ताबूत घोटाला हो चुका है और यह वहीं देश है जहां आज विश्व कप में भारतीय टीम की जीत पर धन की मूसलधार बारिश हो रही है। भारत में पहले एक सचिन ही क्रिकेट के भगवान थे। आज हर खिलाड़ी उस दर्जे में है। पर कारगिल सरीके न जाने कितने युद्ध में देश के लिये सिने पर गोलियां खाकर लहुलूहान होने वाले शहीद के विधवाओं की सूनी कलाई, पथरायी आंखों को सांत्वना देने के लिये न तो सरकार के पास वक्त है ना ही किसी निजी कंपनियां ही आगे आने को तैयार। क्या विज्ञापन में उन शहीद योद्धाओं के परिजनों के लिये कोई जगह नहीं हो सकती। क्या मुंबई व कारगिल युद्ध में शहीद हमारे जांबाज अफसरों के परिवार पोलियो के खिलाफ जंग में विज्ञापन करते टीवी पर नजर नहीं आ सकते। क्या उनकी पुकार, अपील देश के लोग नहीं सुनेंगे। या उन्हें सुनाया नहीं जा रहा। वे अंधेरे की गुमनाम जिंदगी जी रहे हैं, दरकिनार हैं। कहां हैं,किस हाल में हैं, किसे-क्या पता। यह क्रिकेट आज उस महायुद्ध से भी बड़ा हो गया है जिसने न जाने कितने घरों की रोशनी बुझा दी। बच्चे आज भी पिता की याद में मोमबत्तियां जलाये सूनी रातों में आंसू बहा रहे हैं। बूढ़े कमजोर कंधों से अपने बेटे की अर्थी उठाने वालों का दर्द आज भी उनके सिने के बालों में पिरोये हैं। क्या किसी केंद्र या राज्य सरकारों के पास फुर्सत के दो पल उनके लिये हैं जिनका कोई अपना दिन-रात, धूप-बारिश की परवाह किये सरहद की हिफाजत में जुटा रहा ताकि हम चैन ी नींद सो सकें। मुंबई हमलों के शहीद हों या कारगिल में छलनी होने वाले, देश के नाम पर मर मिटे हमारे शहीदों के परिजन किस हाल में जी रहे किसी ने सोचा या सोचने की कभी जरूरत महसूस की। शायद नहीं। कहां हैं सरकार के नाम पर सत्ता का सुख पाने वाले। रोते-बिलखते बच्चे, विधवाओं की चीख, बूढ़ी मां का कलेजा व लाचार बाप के थक चुके पांव को मरहम लगाने वाला इस देश में कोई है। कहां हैं सोनिया गांधी के थिरकते कदम, राष्ट्रपति की चाय पार्टी, हाली, बाली के नामचीन स्नो, पाउडर लगाने वाले। कहां हैं देश में जीत की खुशी में होली-दीपावली मनाने वाले लोग। देश के नाम पर तिरंगा को कफन बनाकर ताबूत में लेट जाने वाले जांबाजों, जिसने सीने को गोलियों से छलनी कर मातृभूमि की रक्षा में अपने परिवारों को भी सदा के लिये तिल-तिल कर मरने के लिये छोड़ दिया। जो अब कभी लौट के नहीं आयेगा दोबारा अपना देश, समाज व परिवार में। जिसके परिवार अब नहीं खेलती कभी होली। दीपावली पर जिसके घर दीप नहीं जलते। क्या उन शहीदों के परिजनों के लिये कभी धन की बारिश हुई है। शायद नहीं। यही लता दीदी टीम इंडिया की जीत के लिये उपवास रखती हैं। कभी उसी ने ही गाया था-ए मेरे वतन के लोगों जरा याद करो कुर्बानी। क्या हममें से कोई है ऐसा भी जो अपने सपूतों को दो पल याद भी कर ले। क्या वतन पे मरने वालों का यही बांकी निशां है। शहीदों की चिताओं पर मेला लगाने वाले आज कहां हैं। क्या कभी इन शहीद के परिजनों को किसी सरकार ने अपना ब्रांड एंबेस्डर बनाया। क्या मैंनेजमेंट की पढ़ाई में कभी किसी शहीद का अध्याय भी जुड़ा है। आज भी हम कसाब को पाले करोड़ों पानी में बहा रहे हैं और हमारे मुंबई हमले में शहीदों के परिजन महज न्याय की उम्मीद में टकटकी लगाये बैठे हैं। विश्व युद्ध सरीके था विश्व कप क्रिकेट। वहीं जुनून, उन्माद, वहीं जोश व उत्साह। हर भारतीयों के दिल में दुश्मनों को छक्के छुड़ा देने की हसरत। करो या मरो की तमन्ना। सिने में तूफां लिये खिलाडिय़ों की टोली। मानो हाथ में गेंद व बल्ला नहीं एके 47 व तोप कोई हथियार हो कि एक ही झटके में दुश्मन क्लीन बोल्ड। जीतना कौन नहीं चाहेगा। चाहे युद्ध हो या क्रिकेट का मैदान। दनादन गोलियां चलती हैं युद्ध में और चौकों-छक्कों से तेजी से रन जुटाते हैं हमारे खिलाड़ी। दोनों ही जगह देश की प्रतिष्ठा जुड़ी होती है। लेकिन फर्क इतना भर है कि युद्ध हम खून की होली खेलकर जीतते हैं और क्रिकेट में जीत पर हम रंगों की होली खेलते हैं। खून की होली खेलकर वो भारत मां की रक्षा तो कर लेते हैं लेकिन सदा के लिये अपनों को रोते बिलखते छोड़ जाते हैं और क्रिकेट में जीत पर अपनों को हम धन से लाद देते हैं। रातों रात खिलाड़ी करोड़ों के मालिक बन गये। क्या नहीं मिला। धन भी, इज्जत भी, बंगला भी कार भी। लेकिन मातृभूमि को अक्षुण्ण रखने की जिसने कसमें खायी थी। सरहदों पर राष्ट्रीय, एकता, समर्पण का जो मिसाल था। देश की माटी को छू कर जिसने हमारी हिफाजत, प्रतिष्ठा को तार-तार नहीं होने देने का संकल्प लिया था। उसके बच्चे को एक बार गोद लेकर तो देखो। पर फुर्सत कहां है हमारे पास। क्रिकेट महज खेल है जिंदगी नहीं। एक खिलाड़ी हारता है तो दूसरा सिर्फ जीतता भर है। उसकी जिंदगी महफूज रहती है। मुंबई में टीम इंडिया ने सचिन के लिये विश्व कप खेला तो श्रीलंका ने मुरलीधरन के लिये। मुरली को एक भी विकेट नहीं मिला। सचिन को कंधे पर बैठाकर पूरे स्टेडियम का चक्कर लगाया गया। यह महज खेल का एक हिस्सा है किसी की जिंदगी नहीं। करकरे आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन हारने के बाद भी संगकारा आईपीएल 4 खेल रहे हंै।  चमन भी अपना है फूल अपने बागबां अपना-तरस रहे हैं मगर लज्जते बहार को हम। क्रिकेट खिलाड़ी करोड़ों में बिक रहे हैं और देश के नाम पर जिसने गोलियां खायीं उसके परिजन आंसू बहा रहे हैं। ये ऐसा फर्ज है जो मैं अदा नहीं कर सकता। मैं जब तक घर न लौटूं मेरी मां सजदे में रहती है। आज हर शहीद की मां सजदे में है यह जानते भी कि उसका लाल नहीं आयेगा कभी लौटकर दोबारा। वह वही मां है जो सिर्फ खोना जानती है। बदले मे अपने तिरंगे के तीनों रंगों को लहू से धोकर फहराना जानती है यह कहते कि शहर का शहर खंडहर में हुआ तब्दील मगर-मां के आंचल में जो बच्चा था वो जिंदा ठहरा। जरा सोचिये। इस देश को किसके हवाले किया जाये। अन्ना हजारे के, क्रिकेट को पैसे से खरीदने वालों के या उस आत्म बलिदान और स्वाभिमान के रंगों में दौड़ते रक्षकों के हाथ जिन्हें हम नमन करना भी भूलते जा रहे। सच मानो-
                                 ऐसे लेने से तो है जान का देना अच्छा-क्या जिए गर जिए अहसान किसी का लेकर।  
          
        

बिकनी, पानी पूरी और रागिनी का एमएमएस


बिकनी, पानी पूरी और रागिनी का एमएमएस

पोस्टेड ओन: May,8 2011 जनरल डब्बा में
देशभक्तों तुम्हारी त्रासदी यह है कि तुम जो नष्ट करोगे वह और भी जिंदा होगा, फलेगा, बढ़ेगा। दो अलग-अलग दिशाओं में दौड़ते लोग आज सांस्कृतिक लक्ष्य को तराशने उसे संवारने, संजोने की पंगत में खड़े नहीं दिख रहे। मानव का स्वभाव आज लाचार, हताश स्थिति में है। मानव होने का फर्ज कोई भी निभाने को तैयार नहीं। मानवता को शर्मसार कर मजा लेने वाले तमाशाई घर-घर में है। हम हंसी के पात्र बनकर समाज के बीच जीना चाहते हैं। लोग हम पर हंसे हमारा उपवास उड़ाये। भले उस समाज के आगे हमें मुंह छुपाकर ही क्यों न गुजरना पड़े। पर मजाल नहीं कि हम अपनी हरकत में सुधार लाने की सोचे भी। हमारा दिखावा मर्यादित,सुसंस्कृत व शिक्षित दिखे इसकी बजाय उसे अश्लीलता के कलेवर में परोसना, संजोना ही हमारी पंसद में शामिल है। चाहे बात बिकनी की हो, पानी पूरी की या फिर रागिनी एमएएमएस की। हर जगह हम समाज के आगे बेबस, लाचार, नंगे खड़े हैं। हमारा मनोबल समाज को आगे बढ़ाने वाला नहीं बल्कि उसे तोडऩे की भूमिका में है। मनुष्य के तीन जरूरीयातों में रोटी, कपड़ा व मकान आदिकाल से सर्वोपरि है। इसमें से दो यानी रोटी व कपड़ा हमारे सामने शर्मसार है। शर्म की रोटी खाकर व बेशर्मी का वस्त्र पहनकर हम किस छत के नीचे रहेंगे इसकी तलाश करना हम जरूरी नहीं समझते। आस्ट्रेलिया में फैशन वीक के दौरान एक माडल ने देवी लक्ष्मी की तस्वीर वाली बिकनी पहन कर रैप पर कैटवाक किया। अब जो धर्म के पहरुए हैं जो धर्म, आस्था को ही परोस कर उसे बिछाकर, ओढ़कर उसी की आड़ में रोटी खा व सेंक रहे हैं वो तो हाय-तौबा मचायेंगे ही। लिहाजा, अयोध्या के धर्म ठेकेदारों ने दिल्ली में आंदोलन की धमकी दी है। इतना ही नहीं मर्यादा पुरुषोतम राम के नाम पर चल रहे राम जन्म भूमि न्यास परिषद भी इससे सहमत इसे संस्कृति का अपमान बता रहे हैं। दरअसल, देवी-देवताओं के साथ मजाक, उसे हंसी का पात्र, फूहड़ता के रूप में परोसना हमारी पुरानी आदत है जो आज हमारी संस्कृति में शुमार उसका अंग है। अब हम मर्यादा की नहीं अमर्यादित होने की तालीम ही आस-परोस में बांट व सीख रहे हैं। कभी चप्पल पर गणेश को हमने ही धारण किया। कभी हमारे संस्कृतिकर्मी,चित्रकार हुसैन ने सरस्वती की नग्न तस्वीर हमें दिखायी। हमारे सिनेमा उद्योग के नामचीन लोग हमें हर रोज घर से लेकर बाहर तक नग्नता ही दिखा, परोस रहे हैं। स्कूलों में बच्चों की हरकत से हमारी आंखें हर रोज झुक रही है। चुंबन से ही बच्चे आज एक दूसरे का अभिवादन कर रहे हैं। बच्चों खासकर लड़कियों की वेश-भूषा पर अभिभावक मौन खड़े हैं। फूहड़ कपड़े जिसके बीच से मर्यादा कहीं सुरक्षित नहीं, खुद अभिभावकों की ही देन है। मानवता हर जगह शर्मसार है। चंद रुपयों की खातिर आदमी नैतिकता, समाजिकता तो दूर किसी के भी जीवन से खेलने से बाज नहीं आ रहा। पानी पूरी। बच्चों की पहली पंसद, महिलाओं की दूसरी व पुरुषों की तीसरी। पानी पूरी बेचने वालों के आगे की भीड़। लेकिन आपको अगर यह मालूम पड़े कि जिस पानी पूरी वाले के यहां से आपके बच्चे अभी-अभी पानी पूरी खा कर लौटे हैं उस पानी में पेशाब था। तो आप क्या करेंगे। दुकानदार को मारने दौड़ेगे। उसे अपने मोहल्ले के नुक्कड़ से भगायेंगे या फिर पुलिस को खबर करेंगे। जो भी हो आप-हम कुछ न कुछ सबक सीखाने की तरकीब जरूर निकालेंगे, सोचेंगे। मगर ऐसा कतई नहीं हो रहा है। मुंबई के एक पानी पूरी वाले ने इसी तरह की हरकत कर संवेदनाओं को झकझोर दिया है। वह हर दिन पेशाब पानी पूरी में मिलाकर बेचता था। सचमुच, यह घृणात्मक कृत्य, कार्य सोचनीय है। जो न सिर्फ नैतिकता के खिलाफ शर्मनाक है बल्कि स्वास्थ्य के साथ भयानक खिलवाड़ भी। ऐसे में भाजपा जैसी सुशिक्षित पार्टी इसका विरोध जताने, इस पर कुछ बोलने व प्रतिरोध करने के उस हिम्मती युवती को आड़े हाथों लेते न सिर्फ अमर्यादित टिप्पणी सरेआम की बल्कि उस युवती को वेश्या या रेड लाइट एरिया की किसी महिला से भी घटिया मानसिकता वाली करार दिया। यह पूरे महिला बिरादरी को ही न सिर्फ कलंकित, अपमानित करने वाली हरकत है बल्कि उस साहस, पराक्रम व हिम्मती युवती को कटघरे में खड़ा कर पूरे समाज को नंगा कर देने की स्थिति, मनोदशा का परिचायक है। वह युवती जिसने उस दुकानदार को पानी पूरी में पेशाब मिलाते तस्वीर पूरी दुनिया के आगे परोसी, आंख खोलने का कार्य किया उसकी बहादुरी को सलाम करने के एवज में हम उसे वेश्या के कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। दिल्ली की एक लड़की दीपिका की जिंदगी पर बनी फिल्म रागिनी एमएमएस एक अलग विवाद लिये हमारे सामने अनगिनत प्रश्न लिये खड़ा है। बहुचर्चित एमएमएस कांड पर बनी यह फिल्म कुछ अतरंग दृश्यों के चलते भले ही विवादास्पद हो पर सोचनीय यह है कि उस लड़की का ब्वायफ्रेंड चोरी-छिपे अतरंग क्षणों को कैमरे में कैद कर लेता है। आम जिंदगी में हर रोज लड़कियां वयस्क होती जा रही है। इस पर लगाम लगाने की समर्थ सोच अभिभावकों में नदारद है। क्या तय नहीं है कि संकीर्ण मानसिकता में हमने जीना सीख लिया है। अपनी ऊर्जा विकास व सांस्कृतिक समृद्धि की दिशा में पहल करने की सोच, ताकत हमने खो दी है। कहां है आम लोग। क्या ऐसे ही मर्यादा को तार-तार होते हम देखते रहेंगे और बनता रहेगा हर दिन नग्नता का एमएमएस।

ये नग्न होने का गेम


ये नग्न होने का गेम

पोस्टेड ओन: April,23 2011 जनरल डब्बा में
बच्चे जन्म लेते हैं नग्नावस्था में। पांच दिनों तक उसे नग्न ही रखने का रिवाज है। वैसे इस बीच भी उसे कपड़े में ही लपेट कर रखा जाता है। छठे दिन वह विधिवत कपड़ों के आवरण से ढक दिया जाता है। जो जीवन भर का क्रम बन जाता है। उसके बाद उसकी जिंदगी जैसे-जैसे जवान होती है। नये-नये परिधानों से वह लैस, फैशन की दुनिया में प्रवेश कर जाता है। यानी कपड़े हमारी पहचान में शुमार हो जाती है। मौत आती है तो शमशान घाट पर फिर लोग, परिजन उसे नग्नावस्था में ही नहा कर पंचतत्व में प्रवाहित कर देते हैं। यही हमारा धर्म है। हमारी विरासत, संस्कृति, आदर्श व संस्कार हैं जिसे हम पीढिय़ों से निर्वहन करते मर्यादित कहलाते आ रहे हैं। समय बदलने के साथ हमारी सोच बदली है। अब हम उस सनातन धर्म, परंपरा को तोडऩे पर आमादा हैं। नग्नता को प्रोत्साहित उसे ब्रांडेड बनाने पर हम तुले हैं। आज हमारी संस्कृति, धरोहर, सांस्कृतिक हालातों को तार-तार करने को नग्नता उत्सुक है। नतीजा, आज हम नग्न होते जा रहे हैं। बात-बात पर नग्न हो जाना हमने सीख लिया है। फिल्में पहले भी बनती थी। उस दौर की नायिकाओं में कपड़े उतारने की होड़ नहीं दिखती। आज की नायिकायें कपड़ा उतारना ही सबकुछ समझने लगी हैं। क्या उन दिनों की नायिकाओं में सेक्स अपील का अभाव था? आज की हीरोइनें कपड़ा पहनना ही नहीं चाह रही। इसे उतारकर ही अपने अभिनय का लोहा मनवाना चाह रही हैं। अब नग्न होने का रिवाज ही चल पड़ा है। जिसे देखो वह नग्न होने की बात कर रहा है। मैं नग्न हो जाऊंगा, तुम भी नग्न हो जाओ। हम सब नग्न हो जायें। थ्री इड्यिट फिल्में सुपरहिट हुई लेकिन उसके अंतिम दृश्य में बच्चे का जन्म होते दिखाना हमारे समाज की आज मांग है। हाल की शुरूआत पूनम पांडेय ने की। अब शाहरुख खान इसमें शामिल हो गये हैं। कल कोई और शामिल हो जायेगा। सब अलग-अलग नग्न होने का ऐलान कर रहे हैं। कब कौन नग्न होगा इसका चार्ट चाहने वाले बना रहे हैं। लंबी सूची है। अब रालिंग स्टोन लेजेंड मिक जैगर की बेटी स्कारलेट जैगर के लिये बेपर्दा होंगी। आगामी जून का समय इसने नग्न होने के लिये तय किया है। एक पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर वे रंगीन नग्न दिखेंगी। इधर, किंग खान शाहरुख भी नग्न होने की तैयारी में हैं। उन्होंने भी कहा है कि उनकी टीम कोलकाता नाइट राइडर्स आईपीएल-4 के फाइनल में पहुंचती है तो वह शर्ट उतारकर अपने सिक्स पैक एब्स सबको दिखायेंगे। भई, दिखाओ। जिसके पास जो है वही दिखाओगे। प्रकृति के पास वादियां हैं, फूल है खुशबू है। हरे-भरे पेड़ हैं। बारिश है। धूप है तो वह हर दिन हमें दिखाता, अहसास कराता है। अब तुम्हारे पास नग्न होने के अलावा कुछ है ही नहीं तो तुम और क्या दिखाओगे। हो जाओ शुरू। अब देखो ना। एक बावर्ची को भूख लगी। वह नशे में था। भूख के आगे क्या करता। अपनी ऊंगली ही पकायी, भूना और खा गया। वैसे भी मनुष्य कुछ नया करने की हर समय सोचता है। ताकि उसे नाम, शोहरत, पैसा मिल सके। आस्ट्रिया के 26 साला प्रेमिका मेलानी सेवर व उसके 31 साल के प्रेमी रिगी शैनर ने निवसर््त्र होकर शादी रचायी है। अब दूसरे ने भी यही बेहतर समझा। शादी के लिये बैडिंग ड्रेस के पैसे बचाने के लिये आस्ट्रेलिया के एली बार्टन व फिल हैंडीकोट भी निवसर््त्र होकर विवाह रचाया। इंडिया में ये रिवाज अभी रच-बस ही रहा है। धीरे-धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय। अब बाडीगार्ड बनने के लिये अपने सल्लू मियां बाडी बना रहे हैं तो हो सकता है ये इश्क की बीमारी में वो भी कुछ नया कर जायें। सौरभ दादा पहले ही शर्ट उतार कर दिखा चुके हैं। अब हमारे पास दो ही रास्ते हैं। या तो हम धर्म, परंपरा, मर्यादा को बचाने के लिये गीता के श्लोक, कुलक्षये प्रणश्यंति कुलधर्मा: सनातना:। धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मो भिभवत्युत :।। अथार्त कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं,धर्म के नाश हो जाने पर संपूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है, इसलिये धर्म की रक्षा करना बहुत आवश्यक है। इसे मान लें। इस पर अमल करें या फिर आंख मूंद कर सब कुछ चुपचाप निहारते रहें। वैसे भी, नग्नता और नग्न दिखना भारतीय संस्कृति को नये सिरे से परिभाषित करने को तैयार है। बस, इंतजार है हम कितनी जल्दी उसे जीवन में उतारने की इजाजत देते हैं। सो, हो जाइये तैयार नग्न देखने और होने के लिये।
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

abhijeet kumar के द्वारा
April 25, 2011
सर आज सुबह सुबह आपके इस लेख को पढ़कर लगा की हम इस दौर-भाग और फैशन की दुनिया में अपने आपको अपने संस्कार को ही दरकिनार कर चुके हैं ! मै शब्दों में बयाँ नहीं कर सकता की आपके लेख को पढ़कर मै कैसा महशुस कर रहा हूँ ! मै आपके इस लेख को अपने सभी दोस्तों को फॉरवर्ड कर रहा हूँ !
आपका
अभिजीत कुमार उर्फ़ अमर
    manoranjanthakur के द्वारा
    April 25, 2011
    shri amar ji many thanks
    amanoranjan के द्वारा
    April 25, 2011
    sshri amarji thanks a lot
raman के द्वारा
April 25, 2011
भाई आप गज़ब की लिखते हो
sneha के द्वारा
April 25, 2011
congrats mamaji , ur article really deserves appreciation and attention of todays youngsters
    manoranjan thakur के द्वारा
    April 25, 2011
    सही कहा है आपने सनेहाजी युवा बर्ग को आज सोच क़र कदम बढ़ाना होगा सराहना पर बधाई
ritesh के द्वारा
April 24, 2011
लेखनी मे बहुत दम है
ऐसा ही कुछ और पढने को जी करता है
बधाई
manoranjan thakur के द्वारा
April 24, 2011
thanks
aabhay mishra के द्वारा
April 24, 2011
bbahut sunder likhte hai aap
bbahut badhai
rahulpriyadarshi के द्वारा
April 24, 2011
जीवन की नश्वरता में विश्वास करते हैं ये नग्न लोग,जन्म से नंगे,मृत्यु के बाद भी नंगे,जीवन के बीच में भी नंगे की पुरकश कोशिश कर मनुष्यों को जीवन के यथार्थ से परिचित कराते रहते ये पूजनीय प्रतिष्ठित हस्तियाँ मानवता के लिए अपनी लज्जा की आहुति देते आये हैं,मैं तो कहता हूँ कि इन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिलना चाहिए,इनकी वजह से ही कई चरित्रहीनों के मन में अपार आभासिक शांति मिलती है,शाहरुख़ कि नंगे तो पहले भी दिख चुकी है,लेकिन पूनम पाण्डेय ने वादे को नहीं निभाकर करोड़ो दिलों को ठेस पहुंचाई है,कपडे उतारने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके बाद लोगों को इनका भौंडा अभिनय भी देखने कि परवाह नहीं रहती,पता नहीं यह नैतिक परचम कहाँ तक लहराएगा,आपने बहुत सही लिखा है.
    manoranjanthakur के द्वारा
    April 24, 2011
    आपकी बातों से सहमत हू इन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिलना ही चाहिए सहारना के लिए थैंक्स
abodhbaalak के द्वारा
April 23, 2011
क्या बात है मनोरजन जी, नंगो पर आपने …………..
सुन्दर रचना
http://abodhbaalak.jagranjunction.com/
    manoranjanthakur के द्वारा
    April 24, 2011
    आपके सुदंर सराहना के लिए ,many many thanks