Friday, September 16, 2011

जिंदगी ना मिलेगी दोबारा


जिंदगी ना मिलेगी दोबारा

पोस्टेड ओन: 18 Jul, 2011 जनरल डब्बा में
जिंदगी दोबारा नहीं मिलेगी। यह बहुत कम लोग सोचते हैं। वैसे भी जिंदगी सब अपने-अपने तरीके से जीते हैं। जीना भी चाहिए। जिंदगी उनकी है। वो जिस तरीके से चाहे अपनी जिंदगी जी सकते हैं। सबसे अहम यह है कि आखिर जिंदगी है क्या चीज। लोग कहां से आते हैं। कहां चले जाते हैं। आने और जाने के क्रम में वो क्या करते हैं। उन्हें क्या नहीं करना चाहिए। जो वो करते हैं वो कहां तक सही है। जो नही करते वो कहां तक उन्हें करना चाहिए। वो जिस चीज को नहीं किया क्या वह ठीक है या उन्हें वो करना चाहिए था। तमाम सवालों के बीच प्रश्न है जीवन क्या है। हमारे जीने का मकसद क्या है। बच्चा पैदा करो। बच्चे में लग जाओ। उसको बड़ा करने में लगे रहो। पढ़ाने में जुटे रहो। उसको लायक बनाओ। फिर उसे नौकरी नहीं मिलने का टेंशन लो। उसका टेंशन लेकर किसी तरह उसे नौकर मिल जाने तक लगे रहो बच्चों में। इस क्रम मे अपने मां-बाप को भूल जाओ। बूढ़े मां-बाप से बात करने की फुर्सत तलाशते रहो। उसे तिरस्कार भाव से देखते रहो और अपने बच्चों को पालते रहो, उसी में लगे रहो। फिर उस नौकरी पेशा बच्चों की शादी करो। शादी करके वह फिर तुम्हारी ही तरह गलती दोहराएगा। करेगा वो भी तुम्हारी ही तरह एक बच्चा पैदा। चूंकि वो तुमसे ज्यादा पढ़ा-लिखा है, कानवेंट का प्रोडक्ट। फर्राटेदार अंग्रेजी साथ में और भी बहुत कुछ। आखिर वो ठहरा जो तुमसे ज्यादा अपडेट, सो ऊंची सोसायटी की बात करने लगा है। अपने बच्चों को नामी शहर के नामी कानवेंट में दाखिला करवा रहा है। हजारों रुपये नाम लिखाने में खर्च कर रहा है। उसका बेटा हर रोज कानवेंट स्कूल से पढ़कर घर लौटता है। तोतली भाषा में अपने डैड व मॉम को नए-नए खिस्से सुनाता है। मां-बाप उसी से खुश हैं। अपने मां-बाप को भूल जाने का गम उन्हें नहीं है। वो तो हर रोज उसी बच्चे को पालने में लगे हैं। बड़ा होकर वो भी नौकरी करने लगा है। अपने मां-बाप को भूल अपनी बीवी के साथ मौज ऐश कर रहा है। अभी इसके बच्चे नहीं हुए हैं। डाक्टर कहते हैं, कम्लीकेशन है पत्नी को, जिसकी दवा चल रही है। सुबह-सुबह ही क्लिनिक से खुशखबरी आयी है। पप्पू पास हो गया है अब वो भी लोगों का मुंह मीठा करवाएगा। दवा असर कर गयी है। वो बाप बनने वाला है। उसकी पत्नी गर्भवती है। उसे लगने लगा है जैसे उसे प्रधानमंत्री की कुर्सी रातों-रात मिल गयी हो। खुशी से वह झूम उठा है। घर में तरह-तरह के खिलौने सजा दिये गये हैं। सुंदर बच्चों की तस्वीर कोने में, बेडरूम में लटक गए हैं। अभी से ही वह अपने बच्चे का रूम भी सजाना शुरू कर दिया है। यानी अभी से उसे अलग रखने की तैयारी हो गयी है। बड़ा होकर ऐसा ही बच्चा अपने मां-बाप से अलग हो जाता है। मां-बाप की जिंदगी को ठुकराकर, उससे बंटवारा कर अपने को अलग कर लेता है। रहता है अपनी बीवी व बच्चों के साथ कहीं दूर किसी अंजान शहर में। जहां उसे देखने वाला पहचानने वाला उसे अपना कहने वाला कोई नहीं है। सिर्फ मतलब के सब यार हैं। इनके साथ समय वो गुजार लेता है लेकिन अकेले में खुद को दुत्कारता भी है कि किस लोगों के साथ वह उठता-बैठता है। उसके साथ जो कहीं से भी मानव जैसा बर्ताव नहीं करते हैं। खुद आदमी होते हुये जानवरों जैसा सलूक करते हैं। ईमान-धर्म को बेचकर दूसरों का पैसा भी हजम-हड़प लेना चाहते हैं। बेचता है वह रोज अपने ईमान को, बीवी को भी दाव पर लगाने से नहीं चूकता है। उसके लिये पैसा से बढ़कर कोई भगवान नहीं है। उसके लिए जीवन का, इस खूबसूरत जिंदगी का मकसद ही यही है पैसा कमाओ चाहे जहां से भी लाओ। पत्नी कहती है पैसा लाओ, बच्चे कहते हैं पैसा कमाओ। इसके लिए चाहे किसी का खून, बलात्कार, डकैती को भी अंजाम देना पड़े तो दो। बिन सोचे दूसरों की जमीन हड़प सकते हो तो हड़प लो। बेच सकते हो खुद को दूसरों के हाथ तो बेच लो बस हर-हाल में पैसा रहना चाहिए अपने पास। यही सोच लेकर आज जिंदा है हर आदमी। दूसरों की जिंदगी से खेलकर खुद पैसे की चाह में भटक रहा आदमी। यह तनिक भी नहीं सोचता, जिंदगी न मिलेगी दोबारा। वह यह नहीं सोचता हर नफस पर, इस जिंदगी पर जिसे तुम जी रहे हो, ना जाने कब स्तब्ध, मौन, ठप पड़ जाए और तुम पंचतत्व में विलीन हो जाओ। अखबारों में खबरें छपेंगी एक आदमी सड़क पर हादसे का शिकार। अपने दो मिनट का मौन रखेंगे, कुछ दिनों बाद तुम भूला दिए जाओगे। तुम्हारा बेटा तुम्हारी कोई तस्वीर जो घर के किसी कोने में पड़ा भी होगा उठाकर कवाड़खाने में बेच डालेगा। अब भी वक्त है। ए मानव, कुछ देर के लिए ही सही ठहरो, रूको और सोचो क्या जिंदगी मिलेगी फिर दोबारा।

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

SATYA SHEEL AGRAWALके द्वारा
July 29, 2011
मनोरंजन जी बहुत अच्छा लगा आपका लेख पढ़ कर शायद इन्सान तो पागल है जो बिना किसी मकसद के भौतिकवाद में डूबा रहता है जबकि उसे मालूम है अंत सबका शून्य ही है.’”जरा सोचिये” नाम से मेरे ब्लॉग पढ़ कर अपनी राय दें धन्यवाद
    manoranjan thakur के द्वारा
    August 15, 2011
    धन्यवाद श्री अग्रवाल जी
shailendra के द्वारा
July 28, 2011
Superb sir…..
your thought are really admirable
Raj Aryan के द्वारा
July 22, 2011
मनोरंजन जी आपकी हर एक कहानी में नयापण और अपनापन होता है….हम आपके रचनाओ का बहुत ही बेसब्री से इन्तेजार करते रहते hain
    manoranjan thakur के द्वारा
    July 25, 2011
    बहुत सुक्रिया राज जी
sujeet jha के द्वारा
July 22, 2011
मैं जिन्दगी न मिलेगी दोबारा चलचित्र व् देखने गया था परन्तु उससे ज्यादा अची रचना आपकी है….
    manoranjan thakur के द्वारा
    July 25, 2011
    thanks sujeetji
Subrat Thakur के द्वारा
July 22, 2011
एक बहुत ही अची सोच आपके द्वारा , जिन्दगी क प्रति नजरिया ….लाजवाब…
    manoranjan thakur के द्वारा
    July 25, 2011
    aap ki sarahna sachmuch lajwaw
Rajesh Thakur के द्वारा
July 22, 2011
जिन्दगी एक जूनून एक दीवानगी है , जिसे उसी जूनून और दीवानगी क साथ जीने पे इसका सही मजा आता है
    manoranjan thakur के द्वारा
    July 25, 2011
    lot of thanks
Santosh Kumar के द्वारा
July 19, 2011
आदरणीय ठाकुर जी , सादर प्रणाम ,…. दिल,दिमाग को हिला देने वाला आलेख ,……..सबकुछ जानते हुए हम अनजान बने रहना चाहते हैं ,…….बहुत बहुत शुभकामनायें .
    manoranjan thakur के द्वारा
    July 19, 2011
    बहुत बहुत धन्यवाद आपको श्री संतोस जी
Nikhil के द्वारा
July 19, 2011
मनुष्य के दोहरे चरित्र का बखूबी वर्णन किया है आपने. सब जानते हुए कुछ न जानने की इंसान की कला के क्या कहने. बधाई.
    manoranjan thakur के द्वारा
    July 19, 2011
    बहुत धन्यवाद
nishamittal के द्वारा
July 19, 2011
शायद यही मृग तृष्णा है,सबकुछ जानते हुए भी इस दुश्चक्र में उलझे रहना.
    manoranjan thakur के द्वारा
    July 19, 2011
    बहुत बहुत बधाई जो आपने सराहा बहुत धन्यवाद
संदीप कौशिक के द्वारा
July 18, 2011
शाश्वत लेकिन कड़वे सत्य का बोध कराता आलेख !!
आपको हार्दिक बधाई आदरणीय मनोरंजन जी !!
:)
    manoranjan thakur के द्वारा
    July 19, 2011
    श्री संदीपजी आपको सुक्रिया बहुत धन्यवाद
Rajkamal Sharma के द्वारा
July 18, 2011
आदरणीय ठाकुर साहिब …..आदाब !
जब एक आम आदमी पर सत्संग में जाकर + श्रधा से सुनी गई बात सुनकर कोई फर्क नहीं पड़ता है तो उसे और किसी की किसी भी बात से कोई भी सरोकार नहीं है सिवाय अपने निर्धारित किये हुए लक्ष्य पाने के …..
बहुत ही सुन्दर पोस्ट के लिए आपका आभार
    manoranjan thakur के द्वारा
    July 18, 2011
    श्री राजकमल भाई बहुत आभार बहुत धन्यवाद
ritesh के द्वारा
July 18, 2011
very intrasting topic thanks
    manoranjan thakur के द्वारा
    July 18, 2011
    thanks riteshji
rajat के द्वारा
July 18, 2011
bahut hi badiya jiwan ka sachitra chitran
    manoranjan thakur के द्वारा
    July 18, 2011
    bahut dhanyabad
abhay के द्वारा
July 18, 2011
very nice and real
    manoranjan thakur के द्वारा
    July 18, 2011
    aap ka sahyog hai
nishir के द्वारा
July 18, 2011
jindgi sahi nahi meelagi dowara
    manoranjan thakur के द्वारा
    July 18, 2011
    aap ne jana sukriya

गदहों का आरक्षण


गदहों का आरक्षण

पोस्टेड ओन: 2 Sep, 2011 जनरल डब्बा में
गदहे अब विदेश जाने लगे हैं। उन्हें पूरी सुरक्षा में लंदन भेजा गया है। लंदन जल रहा था और वहां ये भारतीय
गदहे आराम से मैच खेल रहे थे। ये काम कोई असाधारण गदहा कर भी नहीं सकता था। दूसरे देश के गदहे होते तो कब के मैच छोड़ कर वतन लौट जाते लेकिन इंडियन गदहों की बात ही कुछ और है। ये हाई-फाई नस्ल के गदहे हैं। इन गदहों से शूटिंग करवा लो, बूस्ट, च्यवनप्राश, मैक्स मोबाइल, लाइफ इंश्योरेंस का विज्ञापन करवा लो, कलम, पंखा, बाइक बिकवा लो लेकिन असल जिंदगी में वे गदहे हैं। इन गदहों से मैच जीतने की उम्मीद सिर्फ एक अदद हिंदुस्तानी ही कर सकते हैं। डूबती क्रिकेट की नैया को पार लगाना, उबारना इन गदहों के वश में नहीं। लेकिन क्या कीजिएगा, इन्हीं गदहों को पीएचडी की मानद उपाधि मिल रही है। बिन पढ़े, कालेज गए ही ये गदहे डॉक्टरेट से नवाजे, सम्मानित किए जा रहे हैं। दूसरे ही क्षण इन गदहे को जूते उतारने को भी कहा जाता है। सिर पर मानद टोपी मगर पांव से जूते नदारद, ये तो गदहों के साथ होना ही है। सदियों से गदहे आदमी के वफादार साथी रहे हैं। पीठ पर सिर पर गठरी के ऊपर गठरी लादे, बोझ से दबे मगर पैरों में रस्सी। कूदते रहो अपने मालिक के लिए, जो तुम्हें पहले ही आरक्षण दे चुके हैं। चारों जोन से आरक्षण के बहाने तुम लंदन गये हो। वैसे में, तुम्हारे मालिक बीसीसीआई को फर्क क्या पड़ता है जीतो या हारो। फिलहाल तो मालिक को ये चिंता सता रही है कि उनकी कुर्सी बची रहे। सरकार कहीं राष्ट्रीय खेल विधेयक लागू न कर दे। अगर ऐसा हुआ तो गदहों के साथ मालिक को भी पारदर्शी होना होगा। प्रभावशाली फिर वो हो जाएंगे जो फिलहाल राज्य क्रिकेट संघों में गदहे उपजाने में लगे हैं। मनमाफिक गदहे तैयार कर रहे हैं और खुद की पसंद के गदहों को मैदान में उतारने के लिए बिचौलिए तलाश रहे हैं। खैर, भारतीय क्रिकेट फिलहाल इन्हीें गदहों के सहारे लंदन में जमी, नाक कटवा रही है। इन गदहों के बॉस उम्मीद में हैं कि वन डे में हमारे गदहे रैंकिंग बचा लेंगे। टेस्ट में ताज छीन गयी तो क्या हुआ, टी-20 में हम लुढ़क गए कोई पछतावा नहीं, वन डे तो बाकी है। पर ए मेरे वतन के गदहों के बॉसों, तुम क्यूं भूल रहे हो कि तुम्हारे गदहे कमजोर हो गए हैं। बूढ़े हो चले हैं। उन्हें आराम की सख्त जरूरत है। अब वो मैच जिताऊ, विश्व कप वाले गदहे बिल्कुल नहीं रहे। काउंटी क्लब केंट को पांच रन से हराने से गदहे शेर नहीं हो जाते। अरे, गदहे तो गदहे होते हैं जब तक पूंछ में अंगुली नहीं करोगे आगे नहीं बढ़ेंगे। ऐसे में भला ये बीसीसीआई के होनहार गदहे इंग्लैंड को 4-1 से हराने की कूबत रखते हैं क्या कि श्रीलंका को नंबर दो की पोजिशन से लताड़ मार देंगे। नासिर ने अगर इन गदहों को गदहा कहा है तो इसमें बुरा क्या है। भले इंडियन बुर्जुग गदहों को यह बात हजम नहीं हो रही हो लेकिन बात में बहुत दम है, भले मामला गरम है लेकिन सोचिए, जब बिना पढ़े-लिखे गदहे को लंदन में डि मोंटफोर्ट विश्वविद्यालय से उपाधि मिल जाए, अपना पप्पू वहां पास हो जाए, उसके नाम के साथ डॉक्टर एमएसडी ‘गदहाÓ जुड़ जाए तो हर भारतीयों का सिर गर्व से न तने ये कैसे मुमकिन। भले अगले ही क्षण उस गदहे को जूते उतारने के लिए विवश किया जाए तो इतना तो सहना ही पड़ेगा यारों क्योंकि वे गौरे अंग्रेज जो ठहरे। वे अपने गदहों को भी नहीं बख्शते। इंग्लैंड क्रिकेट टीम के पूर्व कोच डेविड लॉयड को भारत-इंग्लैंड टी-20 मैच से पूर्व ओल्ड टै्रफर्ड बार से धक्के देकर बाहर निकाल दिया गया। अरे गदहे की तरह बार में
लगे खुद की फोटो निहारने लगोगे तो यही होगा। भला कोई आदमी अपनी तस्वीर क्यों देखने जाए। अपुन के देश के अविवाहित गदहों से क्यों नहीं कुछ सीखते। अब देखिए, सलमान इलाज कराने अमेरिका क्या गए, उनकी बहन अर्पिता को एक भारतीय क्रिकेट के होनहान गदहे ने अपना दिल दे दिया और लगे तंदुरूस्ती के लिए रिवायटल का प्रचार करने। कहते हैं, टीवी पर दिख रहे हैं, जब बल्ला नहीं चलेगा तो इंश्योरेंस के भरोसे ही रहूंगा। ये तो आम आदमी का काम है। रिटायर होने के बाद पेंशन पर रहने की। आप तो गदहा हैं, आपके बाप गदहा थे। ऐसे में आप इंश्योरेंस के भरोसे रहने की बात करेंगे तो आगे-आने वाले गदहे हतोत्साहित हो जाएंगे। वैसे भी आपके साथी गदहों के बड़े-बड़े रेस्टोरेंट पहले से हैं, आप भी कहीं खोलकर चना चूड़ बेचना, भला गदहा कहीं निठल्लु रहे। हम तो मान कर ही बैठे हैं कि हर हिंदुस्तानी के अंदर है हीरो। वीरू नहंीं खेले तो देखिए अंिजंक्या रहाणे चमक गए। भई, अपने देश में होनहार गदहों की कमी थोड़े ना हैं। यहां, गली-मोहल्ले में एक से एक नस्ल के गदहे मिल जाएंगे । बस उन्हें चारा खिलाइये, चांस दीजिए। जैसे इग्लैंड टीम के एक खिलाड़ी को आउट होने के बाद भी मैदान में वापस बुला लिया था, फिर देखिए। सब चिरायू अमीन तो हो नहीं सकता कि समझ ले इन गदहों को चराना उनके बस में नहीं, सो राजीव शुक्ल को जो फिलहाल यूपी संघ के सचिव हैं,आईपीएल कमिशनर बनाने की तैयारी शुरू कर दें ताकि वे इन गदहों की पांव में रस्सी फंसाने का काम सही से छान सकें। वैसे भी राज्य क्रिकेट संघों में पहले से ही दिग्गज गदहों के नेता, आसनी जमाए, कुंडली मारे बैठे ही हैं। नरेंद्र मोदी गुजराती गदहों को क्रिकेट के लिए टै्रंड कर रहे है। गोवा के राज्य कैबिनेट मंत्री दयानंद नार्वे गदहों को दौडऩे का अभ्यास करा रहे हैं। पूर्व सेवानिवृत्त गदहे अनिल कुंबले कर्नाटक में हेकों-हेकों कर रहे हैं। भगवान सचिन भी चाहते हैं कि उनका बेटा अर्जुन उनसे भी ज्यादा बीसीसीआई का वफादार व देश का नामी गदहा बनें। जब लंदन में एक बूढ़ा गदहा अपने पहले ही टी-20 मैच खेलते हुए न सिर्फ सन्यास ले सकता है बल्कि इस उम्र में भी तीन गेंदों पर तीन छक्का मार सकता है तो भला, हमारे खेल मंत्री अजय माकन ना उम्मीदी के बीच खेल विकास विधेयक को अगली कैबिनेट में अनुमति क्यों नहीं दिलवा सकते। हे प्रभु, धन्य है यह देश, यहां हर कोई अपने निठल्ले बेटे को बैठे- बैठाए डाक्टरेट करवाना चाहता है। अगर आप भी इस रेस में हैं तो शामिल हो जाइये लंदन की दौर में। कहीं जाने की जरूरत नहीं, बस बने रहिए हमारे साथ, वो देखिए, सामने स्क्रीन पर, ये रहे वर्मा जी, वो रहीं मिसेज आहूलवालिया, अरे ये क्या मि. झाडूवाला भी उन लोगों की टीम में शामिल हो गयीं हैं, जो अपने बेटे को गदहा बुला रहे हैं, गदहा बनाने की तैयारी कर रहे हैं। बड़े होकर ये गदहे और कुछ करे न करे कम से कम टेस्ट मैचों में कप्तानी करते हुए एलन बॉर्डर, ग्रीम स्मिथ के टॉस जीतने का रिकॉर्ड तो जरूर तोड़ देंगे। और तब ये जी, वो जी, झाडूवाले, मिसेज कुलकर्णी आपने एक हाथ में गदहे की मानद टोपी, पगड़ी और दूसरे में जूता उठाए गर्व से सिर ऊंचा करते कहते फिरेंगे- हर हिंदुस्तानी के अंदर है हीरो। तो देर किस बात की, आज ही शामिल हो जाइये, गदहा बनाओ एकेडमी में।

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
September 6, 2011
सिर पर मानद टोपी मगर पांव से जूते नदारद, मनोरंजनजी बस यही
बात लज्जित करती है.वरना खेल में हार जीत तो चलती है.मगर ऐसी करारी
हार भी आसानी से पचने वाली नहीं है.
    manoranjan thakur के द्वारा
    September 7, 2011
    बहुत धन्यवाद जो आपने सराहा
Pawan Thakur के द्वारा
September 6, 2011
अति सुन्दर
    manoranjanthakur के द्वारा
    September 7, 2011
    साधू साधू जो आपने सराहा
surendra shukl bhramar5 के द्वारा
September 4, 2011
मनोरंजन जी कोई अकेडमी खुले इसी का इंतजार है ऐसा …सुन्दर व्यंग्य ..सोचने को मजबूर करता लेख आप का सराहनीय है ..लेकिन आप का ये शीर्षक आरक्षण सिनेमा सा …आज कल महाभियोग भी ……
भ्रमर ५
बड़े होकर ये गदहे और कुछ करे न करे कम से कम टेस्ट मैचों में कप्तानी करते हुए एलन बॉर्डर, ग्रीम स्मिथ के टॉस जीतने का रिकॉर्ड तो जरूर तोड़ देंगे। और तब ये जी, वो जी, झाडूवाले, मिसेज कुलकर्णी आपने एक हाथ में गदहे की मानद टोपी, पगड़ी और दूसरे में जूता उठाए गर्व से सिर ऊंचा करते कहते फिरेंगे- हर हिंदुस्तानी के अंदर है हीरो।
    manoranjan thakur के द्वारा
    September 5, 2011
    श्री भ्रमर भाई आपने सराहा हमेशा मार्ग दर्शन देते रहे यही चाहूँगा
rajet के द्वारा
September 3, 2011
nice post
    manoranjan thakur के द्वारा
    September 3, 2011
    thanks
Amita Srivastava के द्वारा
September 3, 2011
हमेशा हम टीम इंडिया से क्यों जीत की उम्मीद करते है , ये तो एक खेल है |
    manoranjanthakur के द्वारा
    September 3, 2011
    आपने पढ़ा सराहना व मार्गदर्शन के लिए बहुत धन्यवाद
Ravindra K Kapoor के द्वारा
September 3, 2011
Manoranjanji,
Your article is full of pinching remarks but don’t you think that you can not expect victory from any team in every match or series. I do agree that the team members are no longer committed to cricket only and that thing should be denounced. With best wishes…Ravindra
    manoranjanthakur के द्वारा
    September 3, 2011
    sadhubad shri ravindra bhai
s mohan के द्वारा
September 3, 2011
sir
I agree on the point that our team has been performing the worst that they can and appreciate your way you have commented/described.
But dont forget these MEN IN BLUE only has won the WORLD CUP IN T20 and 50 over format for India,
Being very practical, marketing is the much needed phase of life these days and our cricketers are also a part of this. But they can simply cant be called any thing… ..
kyunki har koi janta hai .. pyar aur paisa to samay aur insan ki mool jarorat hain .. wo bhale hum aur aap hoin ya indian team ke player …….
Nd Indians who support Cricket need to support our Indian Team now at this point of time…….
    manoranjanthakur के द्वारा
    September 3, 2011
    s mohanji thanks must support indian team
rajuahuja के द्वारा
September 2, 2011
मनोरंजन जी ,
बेहतरीन गदहापच्चीसी ,ये बुढ्हे गदहे अब जुहू की रेत पर शूटिंग के लायक ही बचे हैं !इनका ध्यान अब क्रिकेट से फ़िल्मी गदहियों में ज्यादा रमता दीखता है ,तभी तो प्रायोजित कार्यक्रमों में ये गदहे आज कल खूब कमर मटका रहे हैं !
    manoranjanthakur के द्वारा
    September 3, 2011
    श्री राजू भाई आप के इस गधा पचीसी ने कमाल केर दिया धन्यवाद
nishamittal के द्वारा
September 2, 2011
मनोरंजन जी ये सत्य है कि हमारे खिलाडियों का प्रदर्शन लज्जाजनक रहा है इसका कारण अत्यधिक खेल,लापरवाही और संभवतः अति आत्म विश्वास है,परन्तु एक पल में भगवन बना देना और एक पल में पाताल में पहुँचाना उचित नहीं.मेरा विचार ऐसा है.
    manoranjan thakur के द्वारा
    September 2, 2011
    निशा जी ,हमारी भी सहमती है धन्यवाद
rahulpriyadarshi के द्वारा
September 2, 2011
किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान…..सौलिड लेख लिख मारा है मनोरंजन जी आपने,मजा आ गया. :D :) :D
    manoranjan thakur के द्वारा
    September 2, 2011
    श्री राहुल भाई बहुत बहुत धन्यवाद सराहना के लिए
sneha के द्वारा
September 2, 2011
very true ……………
    manoranjan thakur के द्वारा
    September 2, 2011
    thank you snehaji
rajkamal के द्वारा
September 2, 2011
आदरणीय मनोरंजन जी ….नमस्कार !
कुछेक बाते ऐसी है जिनसे की मैं अपनी सहमती नहीं रखता
मसलन फैबुलेस क्रिकटरों के बारे में आपके विचारों से …..
और इनको गधा कोई प्राय कहे या फिर कोई अपना प्यारा कहे
दिल पर ठेस तो लगती ही है और दर्द अलग से होता है …..
धन्यवाद
    rajkamal के द्वारा
    September 2, 2011
    कोई बाहरी कहे या फिर अपने ही घर का कोई प्यारा कहे
    manoranjan thakur के द्वारा
    September 2, 2011
    श्री राजकमल भाई सही कहा आपने बहुत धन्यवाद