Thursday, June 2, 2011

बेबसी


बेबसी

पोस्टेड ओन: May,25 2011 जनरल डब्बा में
महिलायें
नहा लेती हैं
खुले में
झोपड़ी के पीछे
उतारकर
सारे कपड़े।
एक-एक कर पोटली बांध कर बगल में रख लेती है बांस के खूंटे पर
आराम से
अंगों को धीरे-धीरे धो-पोछ लेती हैं
खुलेआम, सुकून से
ठीक चौराहे के पीछे
झोपड़ी के उस कोने में।
चारों तरफ जहां घूमती है
लोलुप नजरें
हमारी-आपकी चौराहों से गुजरने वाले बड़े-बड़े हाकिमों की
साइकिल, पैदल, मोटर पर चलने वालों की।
ठीक, उसी के सामने
मिट्टी, साबुन, तेल से
रगड़ती, धो लेती है महिला
छाती, पैरों को
घंटों निहारती है
झोपड़ी के बाहर
उस कोने में
जहां फटी-पुरानी साडिय़ों को घेर
बना है उसका बाथरूम।
यूं ही
एक महिला
जो बेशकीमती बाथरूम में
घंटों निहारती है अपना खूबसूरत बदन
न जाने किस-किस क्रीम से साफ करती है अपने बदन पर उग आये बालों को।
घंटों लेती रहती है
बाथ का आनंद
खूशबूदार, रंगीन टब में
स्प्रे के बीच।
चमकदार संगमरमर में पिरोये
सावर के बीच
नहाती है
बेशकीमती साबुनों, शैपू से
धो लेती है
घंटों मैकअप के अफसाने।
तौलिया लपेटे निकलती है
दुपट्टे से भींगी बालों को समेटे
ड्राइग रूम में
वहां से डाइनिंग हाल
फिर कोरिडोर होते
पहुंचती है बेडरूम
मद्धम संगीत के हौले-हौले
मिठास के बीच
घंटों ड्रेसिंग टेबल के सामने
निहारती है अपना चेहरा
पंखों
एसी के सामने
ड्रायर से सुखाती है
महकती बालों को।
संवारती है,
रंग-बिरंगी चूडिय़ों को बॉडरो से निकालती
रखती, कभी पहनती, कभी बेड पर यूं फेंकती कपड़ों को
चार एंगल से टटोलती है चेहरे को
मेकअप करती है
बिंदी, लिपिस्टक न जाने क्या-क्या लगाती है
यहां
इस झोपड़ी के बाहर
बेबसी, आंखें तरेरे, टटोलती है
टूटे-फूटे बांस, पत्तियों से
गोबर व मिट्टी के लेप के बीच
दरकती, टूटती टहनियों के अहसास में झांकती है
आंखें।
एक फटे-पुराने कपड़े से बालों को झटकती
हड़बड़ी में, सुखाती
लंबे बालों वाली महिला को
जो अभी-अभी झोपड़ी के बाहर खुली सी थोड़ी जगह पर
घास को साफ कर
बना रखी है एक बाथरूम
कोने में पड़ी टूटी
प्लास्टिक बाल्टी से टपकता पानी
उसे इशारा करती
पर निफ्रिक वह
घंटों साफ कर रही है अपने अंगों को
पोछ रही साबुन को पानी के एक-एक बूंद से
धो रही है बिना कुछ सोचे वह महिला।
बीच-बीच में रोते बच्चों को पुचकारती
जो बैठा है वहीं बगल में मिट्टी पर
जहां
हवायें
उस महिला को टटोलती
निहारती है
होठों
हथेलियों को
बाजुओं के बीच उगे बालों को छूती
उसी टाट के पीछे से
झांक रही है
हवायें
वहीं, जहां
एक गरीब
बेबस, लाचार
महिला स्नान कर रही है
झोपड़ी के एक कोने में
निस्तब्ध।
बिना कुछ सोचे, देखे
मौन।
उसे पता भी है नहीं भी।
आंखें मिलती भी है नहीं भी।
वह तो गरीब है
समाज के लिये हंसी, मजाक की महज पात्र है
खूब हंसो, निहार लो तुम जी भरके उसका नंगा जिस्म
देख लो खुलेआम गरीबों का हुस्न
पर मजाल है
जो झांक, देख भी लोगे
कभी
अमीरों की
नंगी औरतों को भी
यूं ही।
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

संदीप कौशिक के द्वारा
May 25, 2011
मनोरंजन जी,
समाज की एक अत्यंत कड़वी हक़ीक़त को बयां करती हुई एक अदद एवं मर्मस्पर्शी रचना !!
बधाई आपको….
    manoranjanthakur के द्वारा
    May 26, 2011
    आपकी यह प्रतिक्रिया सर आखो पर बहुत धन्येवाद
Nikhil के द्वारा
May 25, 2011
समाज के लिये हंसी, मजाक की महज पात्र है
खूब हंसो, निहार लो तुम जी भरके उसका नंगा जिस्म
देख लो खुलेआम गरीबों का हुस्न
पर मजाल है
जो झांक, देख भी लोगे
कभी
अमीरों की
नंगी औरतों को भी
यूं ही।
सार्थक पंक्तियाँ. बधाई.
    manoranjanthakur के द्वारा
    May 26, 2011
    सहारना के लिए बहुत सुक्रिया धन्येवाद

ए मुखिया जी…


ए मुखिया जी…

पोस्टेड ओन: May,27 2011 जनरल डब्बा में
नीतीश सरकार भ्रष्टाचार मिटाने की बात पुरजोर तरीके से कर रही है। पहल भी की है। पूरे देश में नीतीश को आइकान के रूप में देखा गया, जाता रहा है। कई पुरस्कार भी खाते में आये हैं। इनकी सरकार को भ्रष्टाचार विरोधी उसके खात्मे के विशेष पहरुये के रूप में पूरे देश की जनता देख भी रही है और देखना भी चाहिये। दोबारा सुशासन की सरकार लौटी तो सबसे पहले विधायक फंड को चलता किया। ग्रास रूट से भ्रष्टाचार मिटाने के लिये उसके कदम सराहे भी गये। लेकिन एक सवाल सरकार से। इस सरकार में एक तो नीतीश की सरकार है और दूसरे सरकार आप यानी जनता-जनार्दन। दोनों से एक सवाल है। क्या बिहार सरकार यानी नीतीश सरकार कुछ सोचती भी है। कुछ देखती भी है। अगर आपका जवाब हां है तो दूसरा सवाल, अगर सरकार कुछ देखती व सोचती है तो कुछ करती क्यों नहीं? अगर आपका जवाब ना है तो तीसरा सवाल, अगर सरकार न सोचती है ना देखती है तो फिर करती ैक्या है? जवाब साफ है, सरकार वाह-वाही लूट रही है। अगर ऐसा नहीं तो सरकार को उनके प्रदेश में चल रहे कार्यों का तो ठीक-ठीक अनुमान होगा ही। अब थोड़ा, पंचायत चुनाव की चक्कलस कर लें। पंचायत चुनाव का रूझान देखें। यहां कहां है सरकार की तरक्की, भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की कोई बात। सबके सब मुखिया बनना चाहते हैं। लोगों को गोली खिलाया जाता है। आखिर इस मुखिया पद में रखा क्या है। क्यों इस पद के लिये मारामारी हो रही है। लोग गोली खाने व खिलाने की हिमाकत कर-करवा रहे हैं। इस पद के पीछे क्या है। ये हाय-तौबा इस पद के लिये क्यूं? निसंदेह पद ही मलाई वाला है। पूरा मलाई है साहब इसमें। एक बार जिसने खा लिया वो कटोरा लेके सड़क पर उतरेगा ही। जो नहीं खा सका, खाने की इच्छा है कटोरा क्या थाली, चम्मच लेकर घर-घर बौखेगा। मलाई कोई भला क्यों छोडऩा चाहेगा। खुद नहीं बन सका तो पत्नी किस दिन काम आयेगी। वैसे भी नीतीश सरकार में एक पद के लिये दो लोग काम पर लगे ही मिलेंगे। पत्नी टीचर हैं तो बाहर गेट पर पति महोदय मिल जायेंगे। पत्नी आंगनवाड़ी सेविका या सहायिका तो पतिदेव मोटरसाइकिल पर पत्नी को लादे दिन भर प्रखंडों का चक्कर लगाते मिल जायेंगे। पत्नी पंचायत समिति सदस्य तो पति बैठक में भाषण करते नजर आ जायेंगे। तो ये सब साहब नीतीश सरकार में जायज है, चलता है, चलाऊ है। मलाई मुखियाजी अकेले खा लेंगे ये नीतीश सरकार में नहीं चलता। यहां अफसर आराम से कमीशन लेते हैं। लालू राज में कमीशन पहले तय हो जाया करता था, नीतीश सरकार में कमीशन काम के बाद। गुणवत्ता देखकर। वैसे सरकार वेज यानी शुद्ध शाकाहारी हैं। मलाई खाने की आदत है नहीं सो अफसरों को भी पकडऩे की बात सरकारजी बार-बार कह रहे हैं। अब सरकार की सोच में मुखिया जी की कमाई कुछ है ही नहीं। मुखिया तो ठहरा गांव का सेवक। बेचारा कल तक पैदल चलता था आज बोलेरो पर चल रहा है। कल का बदहाल घर और आज की शान-व-शौकत। कल तलक बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते क्या नाम लिखा कर घर पर मटरगश्ती करते रहते थे आज बड़े-बड़े नामी-गिरामी स्कूलों में पढ़-लिख रहे हैं। भाई, सरकार के समझ में यह बात अब तक नहीं आयी है। अगर आयी होती तो कार्रवाई हुई होती। कई मुखियाजी जेल में सड़ रहे होते। सड़े आम की तरह, क्योंकि मुखियाजी हो और खायें नहीं यह बात हाजमोला खा के भी हजम होने वाली बात है नहीं। मनरेगा में ठप्पा लगाया और सब माल बोरे में। कार्रवाई करेगा कौन ये तो केंद्र का मसला है केंद्र जाने। नीतीश सरकार क्यों किसे के खाने पर रोक लगाये। सो,कार्रवाई हुई ही नहीं, मुखियाजी मनरेगा को चाट गये। आंगनवाड़ी को साफ कर दिया। शिक्षक नियोजन में गदहे पास कर गये। अब देखिये ना, एक मुखियाजी के पास एक साल में 60 लाख रुपया मनरेगा का आता है। दो हजार प्रति इंदिरा आवास कमीशन तय है। आंगनवाड़ी, शिक्षक नियोजन समेत कुल अगर सीधा-साधा मुखिया रहा तो पांच करोड़ पूरे कार्यकाल में और तेज-तर्रार जो आज सब है, दस करोड़ तक का जुगाड़ कर लेता है। अब दस करोड़ का कमीशन ही जोड़ लीजिये। साहब, दस करोड़ ना सही पांच ही करोड़ मान लें। एक पंचायत की सूरत बदलने के लिये काफी है लेकिन हाल यह है, रात को सोलर लाइट से रोशनी नहीं जलती। आंगनवाड़ी केंद्र बंद रहते हैं। स्कूलों में बच्चों को मध्याह्न भोजन नहीं मिलता। इधर, लगाातार मुखियाजी मोटे होते जा रहे हैं तो इसमें बेचारे नीतीश बाबू क्या करें। उनके शासन में मुखियों को जेल भेजने की मनाही हैं। जांच होगी नहीं तो जेल भेजेगा कौन? मुखियों से ज्यादा विधायक ही इधर-उधर हो रहे हैं। जहांपनाह, वो देखिये आ रहे हैं मुखियाजी, अभी-अभी जीत के लौटे हैं। फिलहाल पैदल हैं बेचारे आपसे आशीर्वाद चाहते हैं। उम्मीद करते हैं अपने पूर्व के मुखियों की तरह ये भी पंचायत का भला कम करेंगे। खुद की पेट भरेंगे और पांच साल बाद फिर खुद नहीं तो पत्नी को जरूर मैदान में उतारेंगे यही वादा है-आम लोगों से।
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manoranjanthakur के द्वारा
May 30, 2011
बिहार के संदेर्वे मे बढ़िया जानकारी देने के लिय
बहुत बधाई धन्यवाद
Nikhil के द्वारा
May 28, 2011
मनोरंजन जी,
सबसे पहले तो बिहार कि स्थिति कों खुली आँखों से देखने के देखने के लिए साथ ही उस पर अपनी चिंता व्यक्त करने के लिए आभार.
अभी कल ही मैंने बिहार कि GSDP रिपोर्ट कों पढ़ा. कृषि, वन, मत्स्यपालन जिसपर ८०% आबादी गुजर बसर करती है, का वार्षिक उत्पादन २८,२४२ करोड है. १० करोड लोगों कि आमदनी २८,२४२ करोड. इस हिसाब से बिहार कि ८०% प्रतीशत आबादी, ६.५० रूपये/प्रतिदिन कमाती है. राज्य कि उन्नति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है.(As per CAGR report)
दीपक पाण्डेय के द्वारा
May 27, 2011
मनोरंजन जी , एक विचारणीय लेख . मैंने सुना की जब से विधायक फंड बंद हुआ बिहार में तब से लोग मुखिया बन्ने पर ज्यादा जोर दे रहे है. अब इसमें मलाई जो मिल रही है. सच कहा गया है की जितना मुखिया जी दबाते है उसमे गाँव का काया कल्प हो सकता था.
    manoranjanthakur के द्वारा
    May 30, 2011
    श्री दीपकजी बहुत दिन बाद फॉर्म मे लोटने के साथ सुंदर प्रतिक्रिया के लिय धन्यवाद
    manoranjanthakur के द्वारा
    May 30, 2011
    फॉर्म में लोटने के लिय सुक्रिया

बोलो पाकिस्तान में खरीदोगे मकान


बोलो पाकिस्तान में खरीदोगे मकान

पोस्टेड ओन: May,30 2011 जनरल डब्बा में
इस्लामाबाद, एटाबाबाद, लाहौर समेत अन्य रिहायशी इलाकों में छोटे प्लाट आसान किस्तों में खरीदकर भविष्य में घर बनायें या तीन साल बाद विक्रय करके तीन गुणा लाभ कमायें। पाकिस्तान में 8 घूर आवासीय भूखंड बाउंड्री के साथ बिक्री के लिये उपलब्ध है। अन्य जगहों पर आसान किस्तों में जमीन, मकान, दुकान खरीदने के लिये हमारे नजदीक की शाखा से संपर्क करें या हमें लिखें। हमारे पास फाइनांस की भी सुविधा है। फ्री-फ्री-फ्री नो फाइल चार्ज, नो एग्रीमेंट, नो गारंटर, एक से पचीस लाख तक 0 फीसदी ब्याज 33 फीसदी छूट के साथ एक दिन में लोन, एग्रीमेंट। योजना पर कोई शर्त लागू नहीं। पहले आओ पहले पाकिस्तान में जगह पाओ। निराश होने की जरूरत नहीं। योजना सीमित समय के लिये। पाकिस्तान की माली हालत ठीक नहीं है। सो हम भी थोड़ी जल्दी में हैं। हिलेरी कड़ा संदेश देकर पाक से लौट गयी हैं। वहां की सरकार दिवालियापन होने की कगार पर है। आतंकवाद से वह त्रस्त है। ऐसे में पाक सुरक्षा कंपनी को सिविल, भूतपूर्व सैनिक गार्ड, गनमैन, राइफलमैन, सुपरवाइजर, एएसओ व सुरक्षा अधिकारी की जल्द आवश्यकता है। वेतन योग्यता, अनुभव व पोस्टिंग के आधार पर। लाहौर में वेतन अगल से। एटाबाबाद में बोनस के साथ पत्नी के साथ साप्ताहिक छुट्टी बीताने का लादेन के घर में मौका। जहां पोर्न फिल्में एक से एक लेटेस्ट देखिये आराम से। इस्लामाबाद में पोस्टिंग होने पर ईद व बकरीद पर पूरे परिवार के लिये कपड़ों का पूरा रेंज। अन्य लोगों को भी निराश होने की कोई जरूरत नहीं। लचर कानून व्यवस्था को दुरूस्त करने के लिये अलग से ननमैट्रिक, ग्रेजुएट नवयुवक, युवतियों की बहाली की जायेगी। हिलेरी ने इसकी स्वीकृति दे दी है। उसने आइएसआइ प्रमुख पाशा से साफ कहा है कि अब पासा बिल्कुल पलट चुका है। ऐसे युवक-युवतियों को फ्री में आवास भी दें और ट्रेनिंग बाद इन्हें भ्रष्टाचार मुक्ति अभियान में लगायें। उसने राष्ट्रपति जरदारी से साफ कहा कि आतंकवाद को देश से निकाल बाहर करने के लिये इन लोगों की मदद नहीं लेंगे, जल्द भर्ती नहीं करेंगे तो अमेरिका पाक को दी जा रही सहायता को रोक उसे जल्द कंगाल बनाने की दिशा में कठोर कार्रवाई करेगा। इधर, हिलेरी के जाने के बाद पाक सरकार ने भूखंडों को बेचने का निर्णय लिया है। आय-व्यय अंतर पूरे पाक में इस कदर बढ़ गया है कि उसे पाटने के लिये सरकार के पास कोई विकल्प ही नहीं सूझ रहा। सरकार को लगता है कि पूरे इस्लामाबाद, लाहौर समेत सभी रिहायशी इलाकों की जमीन बेचने के बाद भी इस अंतर को कम करने के आसार नहीं के बराबर है। इधर, जमीन के सबसे अधिक खरीददार भारत व अमेरिका में ही ज्यादा दिख रहे हैं। दोनों देशों के बीच इसको लेकर गृह सुरक्षा वार्ता भी शुरू हो गयी है। गृहमंत्री चिदंबरम व उनके समकक्ष अमेरिकी कैनेट नैपोलिटानों ने मुंबई हमलों व आतंक से जुड़े मुद्दों के अलावा इस पर गंभीर मंथन शुरू कर दिया है कि कौन कितनी पाक की जमीन खरीदेगा। इसको लेकर बोली लगाने की भी योजना बन रही है। वहीं भारत व अमेरिका से फिलहाल युवक-युवतियों की टीम भेजने की योजना बनायी जा रही है। इसके लिये ओबामा ने मनमोहन सरकार को पहल करने की पेशकश की है। जिन भारतीय युवक-युवतियों को पाकिस्तान में जाकर लचर कानून व्यवस्था को दुरूस्त करने की कला मालूम हो, जो पूर्व सैनिक व अन्य लोग पाक की जमीन जो कल होकर भारत की ही होने जा रही है उसे बचाने की कसम, संकल्प लेने की सोच रहे हों हमारे वेबसाइट पर आयें हमें लाग आन करें, हमें लिखें या फोन करें। शर्म करने की कोई जरूरत नहीं क्योंकि पाकिस्तान में इंडिया में आतंकी हमलों को टीवी पर दिखाने के लिये गायक, गीतकार, कलाकार की भी आवश्यकता है। एलबम बनाने, रीलिजिंग सेंसर करवाने के लिये जल्द मुफ्त में मिलें। जो लोग इस पूरे साक्षात्कार के दौरान, लिखित देश भक्ति की परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं होंगे उन्हें जो भाई पाक में जमीन खरीदेगें वहां वैसे लोगों को मोबाइल, इंटरनेट टावर लगाने के काम में लगाया जायेगा क्योंकि पाकिस्तान में इन दिनों महिलाओं में कार्टून देखने का बहुत क्रेज, फैशन बढ़ गया है। आतंकी हमलों का कार्टून देखना वहां की महिलाओं की पहली पंसद है। सो तैयार हो जाइये, हमसे संपर्क साधिये और मालामाल हो जाइये। इसके लिये आप हमें एसएमएस भी कर सकते हैं, लड़कियां अपना एमएमएस भी भेज सकती हैं। फिलहाल हमारे मोबाइल का मैसेज बाक्स भर गया है। वेबसाइट भी वीजी बता रहा है। देखिये, अभी-अभी हमारे पास एक एमएमएस भी आ चुका है। यह एमएमएस है हैडली की पहली पत्नी शाजिया का। हम दिखायेंगे, बतायेंगे हमारा यह एपिसोड फिलहाल जारी है। रूकते हैं, एक युवती का बार-बार फोन कट जा रहा है पूर्व सैनिक का फोन आ चुका हैं उनसे बातें करने के बाद जल्द लौटते हैं पाकिस्तान की एक और कहानी लेकर। बस बने रहिये हमारे साथ…।
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

A. K. JHA के द्वारा
May 31, 2011
very nice post
    manoranjanthakur के द्वारा
    May 31, 2011
    respected sri,jhaji alot of thanks for visiting my site

राज किरण का पागल हो जाना


राज किरण का पागल हो जाना

पोस्टेड ओन: June,1 2011 जनरल डब्बा में
सिनेमा उद्योग का तिलिस्म भी अजीब, रोमांचक है। इसमें ग्लैमर है। पैसा है, शोहरत है, दीवानगी है तो गुमनामी, एकाकीपन, मुफलिसी, घुटन भरी जिंदगी भी कम नहीं। भले यह उद्योग भारतीय लिहाज से बड़ा हो। इसमें चकाचौंध, जिंदादिली का पुट भी समाहित हो। आधुनिकता की बयार में यहां सब मिठास, चकमक लबरेज लगे कि उसमें खो जाने को दिल बेचैन हो जाये। लेकिन हकीकत उस मेकअप मानिंद है जिसका ऊपरी हिस्सा तो सफेद, सुर्ख दिखता है पर अंदर, भीतरी हिस्सा उसका असली चेहरा काला स्याह से भी भयावह, डरावनी है। इस उद्योग की जमीनी फलसफा, यहां की हावो-हवा, सच्चाई की खुलती परत दर परत, नग्न होते चेहरे, उस फैंटासी, आधुनिक चकाचौंध भरी जिंदगी को किस हद तक डरावनी तरीके से खंगाल, उकेर, परोस रही है यह सच धीरे-धीरे किताब के पन्नों की तरह साफ उजागर, सामने आ रहा है। तमाम सुख-सुविधा, तामझाम के बीच भी एकाकी जिंदगी जीते हमारे नामी-कलाकार, अभिनेता रात भर पार्टियों में गलबाहियां करते ये समाज के हीरो-हीरोइनें सुबह होते ही उसी एकाकी, अकेलापन की घुटन में जीने को अभिशप्त हो उठने की पीड़ा से छटपटा, कराह उठते हैं। पिछले दस वर्षो से सफल अभिनेता राज किरण कहां हैं? किसी को मालूम नहीं। किसी को पता ही नहीं चला, न लगाया गया कि आखिर राज किरण कहां, किस दशा, स्थिति में हैं? कोई खोजने, पता लगाने की स्थिति में नहीं तत्पर दिखा। इतने बड़े उद्योग में अपने एक साथी की तलाश के लिये किसी के पास वक्त नहीं। इस उद्योग की भागम-भाग तेज दौड़ती जिंदगी में दो पल किसी के लिये निकाल लेना मुश्किल। उस शख्स के बारे में जान लेने की फुर्सत किसी के पास नहीं कि कल-तलक जो साथ था। उनके साथ शूटिंग, पार्टियों में व्यस्त उनके साथ कदम ताल मिलाता था अचानक कहां खो, गुम हो गया उसका राज किरण। हकीकत तो इतने शर्मसार करने वाले हैं कि जानकर सांसे भी दो मिनट के लिये थम जाये। राज किरण, पागल हो गया है। पहले पत्नी ने धोखा दिया। फिर बेटे ने नाता तोड़ा। इतना ही नहीं। दोनों ने मिलकर राज किरण के साथ जो छल, प्रपंच का नाटक बुना, तैयार किया परिणति सामने है, राजकिरण पागल हो गये हैं। अपनों की वेवफाई में तिल-तिलकर बिखरते-टूटते राजकिरण तमाम रोशनी के बीच अंधेरे में गुम होते चले गये। जब तलक भरपूर दौलत, शोहरत साथ था अपनों ने साथ दिया। आहिस्ता-आहिस्ता बुना जाने लगा फरेब व स्वार्थ का जाल जिसमें राज किरण फंसते, उलझते चले गये। पत्नी, बेटे ने जो धोखा का खेल खेला उससे राज किरण लगातार डिप्रेशन में आगे बढ़ते चले गये। डिप्रेशन के शिकार राज दस वर्षों से जिंदगी व मौत के बीच झूलते अमेरिका के अटलांटा के एक पागलखाना में पागल की भूमिका निभा रहे हैं। लोग उन्हें पागल कह रहे हैं। घर जहां से शुरू होती है लोगों की बेहतर जिंदगी की शुरूआत। जब अपनों का नहीं मिले साथ, घर के रिश्ते-नाते वेवफा हो जायें। समाज उसकी मोहब्बत को ठुकरा दे तो कामयाब से कामयाब, नामवाला इंसान दौलत की दल-दल, अपनों की दुत्कार में अचानक गुमनामी में ही अपना घर बसा ले तो आश्चर्य कहां? ऊपर से पूरा फिल्म इंड्रस्टी चुप, मौन खड़ा हो। राज किरण का पागल होना हमारे समाज खासकर ऊंची सोसायटी की संकीर्ण मानसिकता का साफ झलकता चेहरा है। चाहे अभिनेता वयोवृद्ध एके हंगल की भुखमरी का सवाल हो या फिर परवीण बाबी की लाश घर के बेडरूम में मिलने का। रेखा के पति की मौत से उपजे सवाल हों या रोज-रोज के इन हीरो-हीरोइनों के इश्क, रोमांस व अफवाह के किस्से। तलाक का खेल। रोमांस की बातें। एक पत्नी के रहते दूसरी से शादी का जो खेल इस उद्योग में चल रहा है उसका चेहरा समाज के आइनों में कहीं अन्य नहीं दिखाई पड़ता। सिनेमा में काम दिलाने के बहाने युवतियों का शोषण का एक धंधा ही इस उद्योग में फल-फूल रहा है। नये चेहरे आते भी हैं तो जिस्म की नुमाइश की पहली शर्त पर। नग्न होने का जो तरीका इस उद्योग ने अख्तियार किया है वह समाज को कहां, किस हद तक पतन की ओर ले जायेगा यह एक आदमी के पागल हो जाने से भी ज्यादा खतरनाक संकेत, मोड़ पर है।
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